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Friday, 31 July 2020

आस्था, मंदिर और कर्तव्य।


🙏मर्यादा पुरषोत्तम भगवान राम के मंदिर निर्माण को लेकर हमारे समाज में तमाम तरह की चर्चाएं जोरों पर है। जितने लोग उतनी बातें। कोई मंदिर निर्माण की जगह पर अस्पताल की बात करता तो कोई विद्यालय तो कोई काॅलेज की बात करता है। तो कोई मंदिर निर्माण में होने वाले खर्चे को फजूल बता रहा है। सभी की बातें अपने अपने सोच के अनुसार कुछ हद तक ठीक है परन्तु इस पर और गहराई से चर्चा करने और समझने की जरूरत है। इसके प्रभाव व महत्व व असर ताकत को भी जानने व समझने की जरूरत है।

आज इसी पर अपने हृदय की बात को आप सभी से साझा कर रहा हूँ :-

⚘मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम की जय हो⚘
भगवान राम के जीवन का महत्व सिर्फ आस्था से ही नहीं है उनके जीवन आदर्श से है, उनके जीवन मूल्यों से है।

            आज हमारे देश में जो आस्तिक हैं वो सनातनी संस्कृति को तो मानते हैं पर जो नास्तिक हैं वो नहीं मानते फिर भी उनके मन पर अपनी संस्कृति का थोड़ा बहुत असर प्रभाव सकारात्मक है वो बस एक सकारात्मक संगत से समय पर ही बदलता है। इस प्रकार से कहले तो सभी कहीं न कहीं अपनी सनातनी संस्कृति व संस्कार से प्रभावित हैं, न करते हों, न मानते हों फिर भी उनका झुकाव किसी न किसी प्रकार अपने वैदिक कल्चर व संस्कृति के प्रति है। आज इसका अपना एक अलग विज्ञान है जिसे वैज्ञानिक भी स्वीकारते हैं।
            गलत व बेईमान व्यक्ति के साथ भी जब गलत होता है तो वह विचलित हो जाता और वह तब कुछ पल के लिए ही मगर सत्य व सही का पक्षधर हो जाता है। जिससे यह स्पष्ट है कि हर इंसान सत्य, सच्चाई व अच्छाई का पक्षधर है।
            इंसान का अस्तित्व व व्यक्तित्व उच्चकोटि का है और वह अपने संस्कृति अपने संस्कार से जुड़ा हुआ रहता है तो स्वाभाविक है ऐसा व्यक्तित्व अपने घर परिवार में सद्चरित्र और संस्कारी होगा। तब ऐसे व्यक्तित्व पर सहज नही होता किसी के द्वारा अंगूली उठाना। इंसान के अंदर अगर कर्तव्यनिष्ठा का ऐसा ओज है तो समाज में भी उसका अलग प्रभाव होता है और उसकी ओज उसकी कीर्ति संसार में प्रकाशमान होती है।  यह सब सनातनी संस्कृति, संस्कार और अटूट निष्ठा से ही संभव है।

मंदिर निर्माण की मुश्किल आज सहज:-

          अब बात मंदिर निर्माण की करते हैं। श्री राम मंदिर हमारे हिन्दू समाज की सबसे बड़ी महत्वाकांक्षी व प्रतिष्ठित आस्था से जुड़ा हुआ 500 सौ साल पुराना विवादित प्रकरण था। जिसका सुखद अंत सम्पूर्ण मानवता को गौरवान्वित किया है।  हिन्दू व मुस्लिम दोनों सम्प्रदाय के लिए सुखद अहसास रहा है क्योंकि अत्यन्त ही सहजता से इसका निराकरण हुआ। जिसका मजबूत व सकारात्मक पहलू यह है कि दुश्मन देशों के लिए करारी शिकस्त देने का काम किया परन्तु अपने देश के चंद नकारात्मक शक्तियों के लिए यह फैसला जरूर कष्टप्रद रहा है। आज अपनी आस्था अपनी ताकत अपने अस्तित्व के स्तंभ की बहुत बड़ी जीत है। आज विश्व समाजिक पटल पर हमारी छवि हमारी ताकत व हमारी शक्ति लहरा रही है।

आस्था की ताकत व महत्व :-

       जहाँ आस्था होती वहीं विश्वास होता है और विश्वास ही इंसान को ताकतवर बनाता है और उसे उसके गन्तव्य तक लेकर जाता है। विश्वास व भरोसा ऐसा कारक है जो इंसान से असंभव कार्य भी करवा देता है। विश्वास व भरोसा से लवरेज इंसान से सामना करना आम सोच वाले इंसान के बस की बात नहीं होती। 
           आस्था की जीत नकारात्मक शक्तियों का पतन से है उनके मनोबल का ह्रास से है। देश के सशक्त नेतृत्व की शुरू से यही मंशा रही और उसमें वह बखूबी कामयाब रही। जिसको लेकर सत्ता के गलियारे में आते ही एक के बाद एक सशक्त निर्णय लिया और मूर्त रूप देता चला गया। नामुमकिन कार्य भी सहजता से मुमकिन होना नकारात्मक शक्तियों को तोड़ता गया। जिससे खुल कर विरोध करने का साहस व मनोबल पनपने से पहले ही दब गया और कार्य की सफलता सुनिश्चित होता गया।
          सशक्त नीति! सशक्त विचार! सशक्त फैसला! हमारी आस्था! हमारे संस्कार और उनसे हमारा जुड़ाव नकारात्मक शक्तियों के लिए घातक हथियार है, नकारात्मक शक्तियों के लिए व दुश्मन के लिए राफेल से कम नहीं है।
          हम मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा या गिर्जाघर अपने आत्मबल, आत्मशक्ति, आत्मसंतोष के लिए जाते हैं और ईश्वर की आराधना व प्रार्थना व मनन करके हम ईश्वर को अपने समीप महसुस कर अच्छा अनुभव करते हैं और यह संतोष हो जाता कि हमने अपने परमपिता परमेश्वर से अपने मन की बात कर दिया है। मन में एक विश्वास पनप जाता है कि अब वे हमारी बात को पूरा करेंगे और वहाँ से एक नई ऊर्जा व नई शक्ति लेकर निकलते हैं। 
           विचार करें और स्वयं से प्रश्न करें क्या मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारा और गिर्जाघर के लिए इंसान के दिल में आस्था का कोई मोल नहीं है? जवाब में पाएंगे कि "यह सोचना गलत होगा"। जहाँ जाने मात्र से अपने अंदर के तमाम विकारों से मन हटने लगता है सकारात्मकता का संचरण होने लगता है। अब सोच कर बताएं क्या इतना महत्वपूर्ण जगह इंसान के लिए जरूरी नहीं। नकारात्मक सोच रखने वाले इसका मोल नहीं समझ पाएंगे बल्कि ऐसी सोच वाले प्रतिकुल परिस्थितियों में विचलित होकर ईश्वर को भी गलत व झूठा ठहरा देते हैं।

धर्म स्थल इंसान के मनःस्थिति का पावर बैंक :-

          परमपिता परमेश्वर के दरबार में कदम रखने से वहाँ शीश झुकाने से अपने मन की बात करने मात्र से एक नई ऊर्जा व नई शक्ति और मनःस्थिति में असाधारण बदलाव होता है तो ऐसी जगह इंसान के लिए बिलकुल ही पवित्र व अतुलनीय है। और वहीं से स्वस्थ मानवता का उदय होता है। अब आप बताएं क्या जीवन के लिए धार्मिक स्थान प्रासंगिक नहीं है?
           हमारे सोच के अनुसार इंसान के जीवन में विद्यालय व चिकित्सा का महत्व तो है ही उसका भी विस्तार होना चाहिए परन्तु अपने धार्मिक स्थान का विशेष महत्व देने की इसकी ताकत को पहचानने व समझने की जरूरत है। जीवन की शिक्षा दिक्षा के साथ साथ धर्म कर्म व उनके प्रति आस्था भी बहुत जरूरी व आवश्यक है। आज शिक्षा स्तर उनके तौर तरीके हमें हमारे संस्कार व संस्कृति से दूर कर रहा है इसमें खास तौर पर परिवर्तन की जरूरत है।
           इंसान की ताकत अपने जड़ों से जुड़ कर रहने से है। उसका आदर व सम्मान करने से है। जिस प्रकार तना से अलग होते ही पत्ते व फल, फूल का वजूद समाप्त हो जाता है। उसी प्रकार हम अपनी संस्कृति व संस्कार से दूर होकर अपने अस्तित्व व वजूद दोनों का नाश कर रहें हैं। देश के मुल्लापरस्त चंद नेताओं ने भारत की संस्कृति से खेलवाड़ कर फेर बदल कर यहाँ के जनमानस को तोड़ने का काम किया है।

उलाहना से बचें, स्वागत करें! सम्मान करें! गर्व करें :-

       जब भारत का हर इंसान अपनी संस्कृति अपने तौर तरीके को अमल में लाएंगा उसे अपनाएगा उस पर समर्पण भाव रखेगा तभी दूसरे लोग आदर व सम्मान करेगा और अनर्गल करने व बोलने का साहस नहीं करेगा। 
      💀आज बहुत दुख होता है जब हमारे कुछ नासमझ हिन्दू भाई यह कहते हैं मंदिर की क्या जरूरत है? फजूल खर्च है? जिससे हमारा वजूद है जिससे हमारी पहचान है उसी के खिलाफ बोल रहे हैं। क्या उम्मीद करोगे धर्म के अन्य ठेकेदारों से जो धर्म व आस्था के प्रति कट्टर हैं, मन से सोचो....? हम क्या मैसेज दे रहे हैं....?  हमारे संस्कृति का क्या होगा....? हमारा भविष्य पर क्या असर होगा.....?

हमें अपनी संस्कृति व महानता व छवि के लिए अपनी सोच बदलना होगा :-

☛दूसरों के मानसिक पटल पर अपनी सशक्त छवि बनाने के लिए हमें अपना और अपने समाज का सम्मान करना होगा।
☛अपने धर्म अपने संस्कृति को अपनाना होगा उसका प्रचार प्रसार व मान बढ़ाना होगा।
☛हमारी आस्था विश्वास व भरोसा के प्रतिक को सहेजना होगा उनको समाज में प्रतिष्ठित करना होगा।
☛हमारे आस्था के प्रतिक हमारे ईष्टदेवों पर बनने वाले हास्य व्यंग की नौटंकी पर कड़ाई से रोक लगाना होगा।
☛इंसान की पहचान अपनी संस्कृति! उसकी ताकत अपनी संस्कृति! जुड़े रहें! बने रहें! मजबूत रहें।
☛"खूद का करो सम्मान तभी लोग देंगे सम्मान" की नीति को अमल में लाना होगा।
☛हमारी मजबूती हमें एकजूट व संगठित होकर रहने में है।

मंदिर निर्माण से मानव को होने वाली उत्कृष्ट उपलब्धि यानि लाभ :-

श्री राम मंदिर का निर्माण कार्य सम्पूर्ण मानवाता के लिए उसके आस्था व विश्वास हमारे संस्कार व सनातन संस्कृति को अपार बल मिलेगा। अब यह कहना गलत न होगा कि अयोध्या दुनिया का सबसे बड़ा इण्टरनेशनल धार्मिक औद्योगिक केन्द्र होगा। अयोध्या में हर तरह के नव रोजगार का सृजन होगा। पर्यटन उद्योग को बढ़ावा मिलेगा, देश विदेश से पर्यटकों का जमावड़ा होगा। आज हिन्दु समाज की जो महत्वपूर्ण उपलब्धि या लाभ हुआ है उसको शब्दों मे वर्णित करना काफी विस्तार में ले चलना होगा बस यही कहना है कि आज आस्था के साथ साथ अर्थ का एक अनोखा स्तम्भ तैयार होने जा रहा है। स्वर्णिम इतिहास का सहभागी बनने के लिए धन्य हूँ। आप सभी को हृदय से बधाई।

धन्यवाद! आभार :-

         भव्य श्री राम मंदिर के निर्माण के लिए इस महान व पुनित कार्य के लिए हमारी तरफ उन सभी महान शख्सियत को हृदय से धन्यवाद देता हूँ जिनकी वजह से यह शुभ घड़ी पूरे संसार को नसीब हो रहा है। हम गौरवान्वित हैं कि हमें सहभागिता का अवसर मिला! हम धन्य हुए हैं!
सभी को आभार! हार्दिक शुभकामना।
जय श्री राम 🙏
♨♨
✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव (हृदय वंदन)



Thursday, 30 July 2020

जिन्दगी जी लेंगे....



जिन्दगी जी लेंगे...
♨♨
जिन्दगी जीने का नाम जी लेंगे,
करम  तेरा   हर  दुख  पी  लेंगे।

जिन्दगी की  बात  समझ आई,
हर कोई  अपनों से  मात खाई।

जुल्मो सितम  जिन्दगी से करते,
तुमसे  हमदर्दी  रखते  तो  कैसे।

मोहब्बत तो  जिन्दगी  से करते,
जिन्दगी  ही अपनी  तकदीर है।

साथ  जीने  की  हैं कसमें  खाई,
सुख   दुख   दर्द   साथ  निभाई।

बेवजह   दर्द   उसको   पहुँचाई,
दर्द   मुझको   कैसे  न हो भाई।

जिन्दगी  तुमको  है बहुत प्यारी,
फिर  मेरे  पर  क्यों  है  मनाही।

वास्ता  तुम  तो कुछ नहीं रखते,
जाने क्यों  दुश्वारियां  लिए रहते।

ताकत तो अपने  खून में समाई,
खून से  खून की है सारी लड़ाई।

जिन्दगी  जीने  का नाम जी लेंगे,
करम  तेरा   हर   दुख  पी  लेंगे।
♨♨

पंक्ति का भाव :-

☛बड़ी अजीब बिडम्बना अपने समाज की हो गई है। अब परिवार को लेते हैं। परिवार में बड़ा है तो बड़े होने के लिए ललायित है आदर मिलता रहे इसकी अकांक्षा है, जरूरी भी है होना भी चाहिए। अगर छोटा है तो छोटा ही बना रहना चाहता है अपनों बड़ों से चाहे कोई मतलब न भी हो परन्तु फिर भी कुछ न कुछ अकांक्षा परिवार के नाते तो बना ही रहता है। इससे नकारा भी नहीं जा सकता।
☛यदि हम बड़े हैं तो अपने छोटों से बड़े वाले आदर की उम्मीद तो करते हैं परन्तु उनके साथ बड़कपन वाले बात या कार्य बिलकुल नहीं करते जिससे बड़कपन वाले सारे वजूद एक समय अंतराल के बाद समाप्त हो जाता कितना भी कर्तव्यनिष्ट छोटा क्यों न हो।
☛यदि हम छोटे हैं तो बड़ों से भी कुछ उम्मीदे रखते हैं परिवार के नाते, साथ रहने के नाते भले ही आपसी तालमेल में विशेष ताल्लुकात न हो परन्तु मान सम्मान का जो हक है उसमें तरलता समरसता होनी ही चाहिए।
☛बड़े हों या छोटे हों उनका कार्य इस प्रकार का कत्तई न हो खासतौर पर यदि दोनों एक ही साथ एक ही घर में हों तब वे परिवार में उपेक्षित महसूस न करें। क्योंकि उपेक्षा से कटूता पनपती है जो आगे चल कर दोनों के लिए, उनके सुख चैन में, रहन सहन में बाधक होती है। आपसी सामंजस्य बिगड़ जाता परिवारिक वातावरण खराब हो जाता।
☛इस बढ़ती दुराव का असर न चाहते हुए भी तेजी से आगे बढ़ती है और एक दूसरे के अपनों को भी दुराव के चपेट में लेती है और धीरे धीरे हर किसी से हर किसी के बीच मनमुटाव बढ़ने लग जाता फलतः दूरी बढ़ती चली जाती।
☛ऐसी प्रतिकूल स्थिति अपने ही खून में ज्यादा पनपती है।
☛ कहीं भी शेयर करने से पहले दुविधा को आपस में दूर करें।
 ☛बचाव का एक ही रास्ता है और वह है समझदारी।
☛कमियों से एक दूसरे को अवगत कराएं।
☛कोई फैसला अकेले की सोच पर न लें।
♨♨
✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव (हृदय वंदन)

Tuesday, 28 July 2020

काल करे सो आज कर....

काल करे सो आज कर....
♨♨
☛अगर कोई इंसान के द्वारा घर, परिवार या समाज के लिए सार्थक व सकारात्मक कार्य के श्री गणेश करने का प्रयोजन हो तो सभी को एक राय व एक मत से कार्य को मूर्त रूप देने के लिए एक साथ सकारात्मक रूख़ अख़्तियार करते हुए बिना किसी किन्तु परन्तु के निश्चित अवधि में शीघ्रताशीघ्र शुरूवात कर देना चाहिए।
☛घर, परिवार या समाज के कार्य आरम्भ के पूर्व कार्य की सार्थकता के बावजूद अकारण ही किसी सदस्य द्वारा किन्तु परन्तु लगाना या टाल मटोल करना कार्य की सफलता व असफलता पर विचार करने लग जाना कार्य से जुड़े क्रियाशील व्यक्तित्व के मन की स्थिति पर जाने अंजाने प्रभाव डालती है जिससे कार्य के श्री गणेश के समय पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है परिणामस्वरूप कार्य के प्रति जो उत्साह व उत्सुकता होती है वह थोड़ी ढ़िली पड़ने लग जाती है तब आप महसूस करेंगे की कार्य में देरी हुई और आगे चलकर इसका ख़ामियाजा भी भुगतना पड़ता है। तब यह अहसास होता कि कास उस वक कार्य का आरम्भ हो गया होता। तब इंसान के पास सिर्फ अफसोस के अलावा हाथ कुछ नहीं लगता।
☛आजकल के युवा हर बात हर काम को बहुत हल्के लेते हैं कार्य के शुरूआत के उपरान्त कुछ ऐसी समस्या उत्पन्न होती है जिसके बारे आपने तमाम अध्ययन के बावजूद कार्य योजित करने के दरमयान भी दिमाग में नहीं आती है और न ही सोचा रहता। इस प्रकार कार्य के निष्पादन में अचानक आई समस्या कार्य के समयावधि को बढ़ा देती जिस कारण इंसान उससे होने वाली क्षति और कार्य निष्पादन का समय कम होने के कारण कभी कभी इंसान को विवशता व मजबुरी में अपने कार्य/प्रोजेक्ट को बंद करना पड़ जाता है जिस वजह से उसे काफी मानसिक व आर्थिक क्षति उठानी पड़ जाती है।
☛तब इंसान को यह ज्ञान होता है कि घर परिवार व समाज या जीवन से जुड़ी तमाम कार्य जो हमें ही करना और करना अवश्यंभावी है तो उससे दूरी न बनाते हुए टाल मटोल की आदत को नकारते हुए समय रहते उसमें लग जाना चाहिए। जीवन में कभी कल नहीं खतम होता हर एक दिन के बाद कल आ खड़ा होता है। इसलिए आज का आज कर लेना लाभप्रद होता। समय से किया गया हर कार्य हमेशा सुखदायी व फलदायी होता है।
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कबीर जी की अमृत वाणी:- 
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। 
पल  में  प्रलय होएगी,  बहुरि  करेगा  कब ॥
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अर्थ :- कबीर दास जी समय की महत्ता बताते हुए कहते हैं कि जो कल करना है उसे आज करो और और जो आज करना है उसे अभी करो , कुछ ही समय में जीवन ख़त्म हो जायेगा फिर तुम क्या कर पाओगे !!
❤❤
अब  पछताए  क्या होत है,
जब चिड़ियाँ चुग गई खेत।
♨♨
✒.....धीरेन्द्र श्रीवास्तव (हृदय वंदन)




Monday, 27 July 2020

प्यार भी कश्मकश...

प्यार भी कश्मकश...
🍁🍁
मुझ  से  तुम  प्यार  करते हो,
क्यों  साथ मेरे नहीं आते हो।
कुछ  तो  मन  में  तेरे दुविधा,
पर  कहने  से  डरते क्यों हो।
            प्यार का मतलब क्या समझें,
            पास  होकर  क्यों  दूर लगते।
            ऐसे   तो   तुम  जी सकते हो,
            अपना  जीना  मुश्किल होते।
बेरूखी   तड़पाती  दिल  को,
रूसवाई  खतम  तो कर लो।
मन  मुटाव क्यों  खींचा तानी,
अब तो अपने  हल  कर  लो।
            दुख  दुविधा में दम घूटता है,
            महसूस तुमको नहीं होता है।
            मुश्किलों  में जीने से अच्छा,
            सुखी जीवन सहज होता है।
वाकई  प्यार  अगर  करते हो,
कश्मकश  में  क्यों  रहते  हो।
सांसों  की  डोर जब न चटके,
दुखी  जीवन  क्यों  करते हो।
            प्यार में गर कश्मकश होती,
            खुशहाल जीवन नहीं होती।
            तोड़ देते मन दुविधा अपना,
            खुशगवार  जीवन तो होती।
🍁🍁
✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

Sunday, 26 July 2020

वीर_सपूतों_को_नमन....

वीर_सपूतों_को_नमन....
♨♨
कार्गिल विजय दिवस की
तेरे  कारण  ही बधाई  है।
सीमा  पर  वीर  सपूतों ने
अपनी   जान   गवाई   है।
याद  है  उनकी  कुरबानी
नहीं  किसी  ने  भुलाई है।
तुझ  से ही जीवन अपना
सुख चैन की सांसे पाई है।
शब्द  नहीं  गुणगान करूँ
तेरे सम्मान में आज करूँ।
तेरी  जननी  व  पत्नी को
आज विनम्र प्रणाम करूँ।
हम दूसरों को बधाई दे रहे
उन्होंने  प्रियवर  खोया  है।
देश  ऋणी  आज  तेरा  है
किन शब्दों में धन्यवाद दूँ।
हृदय वंदन  है  वीर सपूतों
शत शत विनम्र नमन करूँ।
~~
कार्गिल विजय दिवस की
हार्दिक शुभकामना........
~~
अमर वीर सपूतों को विनम्र श्रद्धांजलि⚘
♨♨

✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव (हृदय वंदन)

Saturday, 25 July 2020

करम की लेखनी न मिटे..


करम की लेखनी न मिटे..
♨♨
हे विश्व नियन्ता शिवाकान्त
पालनहारी हे अवघड़दानी
महादेव शिव शंकर शम्भू
कैलासपति हे त्रिपुरारी
हे केदारनाथ हे जटाधारी
तेरी महिमा जग में न्यारी।

संग सती के धरती पर एक दिन
भ्रमण पर निकले त्रिशूलधारी
देखी माता ने एक दुखियारा
गठरी टाँगे बढ़ा जा रहा 
रोटी की आस लिए अभागा।

देख उसकी दीन दशा 
मन ही मन व्याकूल हुई माता
पीड़ा उसकी सह न पाईं
दीनानाथ सोमनाथ बर्फानी
सर्वेश्वर से गुहार लगाई।

हे प्राणनाथ महादानी
शिवदानी ओमकारेश्वर 
निलेश्वर गणपति कुछ करो
निर्धन असहाय अभागे का
कर दो तुम कल्याण प्रभु।

मंगलेश्वर अर्धनारीश्वर 
नटराजन त्रिकालदर्शी
सुन कर माता की बातें
मुस्कराए बोले हे देवी
भोग रहा कर्मों का फल।
करम में इसके जो लिखा।
इसको टाला नहीं जा सकता।

सुन नागार्जुन देवा की बातें 
माता विषधर से रूष्ट हुई
लेकर अनुमति सर्वेश्वर से
स्वर्ण मुद्राओं की पोटली
देने की ठान चल पड़ी
दुखियारे के राह पर।

जिस पथ से जाए दुखियारा
उस पथ पोटली रख दिया
पास आएगा उठालेगा
अपना दुख मिटालेगा
खुशी की अभिलाषा लिए
दूर से माता देख रही थीं।

पोटली के कुछ दूर पहले ही
निर्धन का ध्यान ऐसा भटका
कैसे नेत्रहीन जीवन जीते
वैसे चल कर देखें तो जरा
बंद कर ली अपनी आँखे
उसने चलना शुरू किया।

माता की खुशियाँ धरी वहीं
अभागा आगे बढ़ चला।
देख करम की लेखनी
चकित हुई दुखी माता।

रुद्रनाथ भीमशंकर 
प्रलेयन्कार रामेश्वर
चंद्रमोली डमरूधारी 
चंद्रधारी के चरणों में
नतमस्तक हुई सती माता।

लिखा करम  में  जो विधाता,
टाल कोई न पाएगा।
अपने करम को ध्यान रखना,
होनी कौन मिटाएगा।
♨♨
✒..... धीरेन्द्र श्रीवास्तव (हृदय वंदन)


Friday, 24 July 2020

जगत श्रेष्ठ प्राणी हैं साहब...


जगत श्रेष्ठ प्राणी हैं साहब
♨♨
जगत श्रेष्ठ प्राणी हैं साहब
ज्ञान दे दो परवाह नहीं
जान दे दो परवाह नहीं
ईमान दे दो परवाह नहीं
कुर्बानी दे दो परवाह नहीं
जगत श्रेष्ठ प्राणी हैं साहब
अराम चाहिए काम नहीं
सब हो पर मेहनत नहीं
बेकार रहलें  दुख नहीं
सकारात्मक  मन  नहीं
जगत श्रेष्ठ प्राणी हैं साहब
~~
जगत श्रेष्ठ प्राणी हैं साहब
काम न करने पर दुख
काम  करने पर  दुख
कुछ अच्छा तो  दुख
कुछ बुरा तो दुखे  दुख
जगत श्रेष्ठ प्राणी हैं साहब
कुछ दे दिया इसका दुख
कुछ न दिया दुखे दुख
कुछ सोच लिया दुख
न सोचा  तो दुखे दुख
जगत श्रेष्ठ प्राणी हैं साहब
~~
जगत श्रेष्ठ प्राणी हैं साहब
गजब इनकी अभिलाषा
पार कोई नहीं पाएगा
बने में माथे पर साधे
न बने तो धरती पटके
जगत श्रेष्ठ प्राणी हैं साहब
इनके फेर में नहीं आना
विवेक खूद अपनाना
संतुष्ट होना मुश्किल है
कर्म सदा नित करना है
जगत श्रेष्ठ प्राणी हैं साहब
♨♨
  
✒......धीरेन्द्र श्रीवास्तव (हृदय वंदन)



Thursday, 23 July 2020

मन की सोच...

मन की सोच...
♨♨
मन की  सोच अज़ीब बहुत है
जाने क्या क्या सोचा  करती।

मन  ही   हमें  तो  पहचाने  है
गलत सही सब कुछ जाने  है।

खुशी में आतुर प्रसार है करती
दुख   में  अपने  ढुंढ़ा   करती।

शिकवा और शिकायत  रटती
इनसे उनसे  पकड़ बतियाती।

जाने  कैसी  मन  की  प्रकृति!
शिकायत उगल पाए निवृत्ति।

तारीफ पे  ठीठकने  की वृत्ति
मन  जुबान सीलबंद  प्रवृत्ति।

बाल  की  ख़ाल  झट निकाले
कैची  इनकी  ज़ुबान संभाले।

बूरा   भला   से  मेल  न  राखें
मनई   कऽ   सम्मान न  जानें।

ऐसी  फितरत   सभी  की  है
कम   किसी   में   ज्यादा  है।

बुद्धि  में नकारात्मकता होती
खुशी  से पहले दुख पर रोती।

रे मन अब चल शांत होजा तु
कब  तक कितना सोचेगा तु।

सबके खुशी का इतना  सोचे
जरूरी नहीं  सब खुश रहें रे।

खुश  होते  वृद्धाश्रम  न होता
खून अपना आश्रम न  लाता।

मन  ही   हमें  तो  पहचाने  है
गलत सही सब कुछ जाने  है।

मन की  सोच अज़ीब बहुत है
जाने  क्या क्या सोचा  करती।
♨♨
कविता का भाव:-
☛एक कहावत है:-"मन के हारे हार है, मन के जीते जीत" जो पूर्णता सत्य व सही भी है।
☛मन की गति मन का फैलाव मन का प्रसार अलौकिक व अकल्पनीय है। अदृश्य मन को पकड़ना रोकना व स्थिर करना उतना ही मुश्किल है जितना सदृश्य में परछाई को पकड़ना व रोकना।
☛मन की सोच कल्पना से भी परे है कब क्या सोच लेगा और कहाँ भ्रमण कर आएगा जिसकी कल्पना करना मुश्किल है। अक्सर मन की जो प्रकृति है वह सकारात्मकता से थोड़ा दूर ही रहती है।
☛मन पर सबसे पहले नकारात्मकता प्रभावी होती है अगर इंसान विवेक शून्य है तो समझलो पतन का मार्ग प्रशस्त होगी। यदि इंसान विवेक शून्य नहीं है विवेकी व समझदार है तो सकारात्मकता को तवज्जो देगा और उत्थान की ओर अग्रसर होगा।
☛इंसान के मन को समझने और जानने का सहज व सरल तरीका उसके आदत, व्यवहार, क्रियाकलाप, रहन सहन, बात चित व संस्कार से किया जा सकता है।
☛इंसान का अपने जीवन में सुखी व दुखी होने व रहने का एकमात्र कारण उसकी मनःस्थिति व मन की सोच पर ही निर्भर करती है और उसके इस कार्य में उसके बुद्धि व विवेक का महत्वपूर्ण योगदान है।
☛हर इंसान का मन सही गलत को बखूबी जानता है उसका का मन बहुत ही सहजता से गलत और सही को इस प्रकार से अलग करता है जैसे सारस दूध से पानी अलग करता है। 
☛बस इंसान का बुद्धि विवेक कुछ न कुछ लोलुपता व अभिमान व अकड़ वश पहचानने से अलग करने से रोक देता और मुश्किलों को बढ़ावा देता। तत्पश्चात घर परिवार व समाज में अनेक प्रकार की बुराईयों का जनम होता है।
☛जीवन में खुशियाँ हो!
☛सोच सकारात्मक हो!
☛बुद्धि विवेक प्रखर हो!
♨♨

✒.....धीरेन्द्र श्रीवास्तव (हृदय वंदन)

Wednesday, 22 July 2020

जरूरत नहीं इंसान से इंसान की।

जरूरत नहीं इंसान से इंसान की।
~~
खतम हो गई जरूरत  इंसान  से इंसान की।
किससे उम्मीद करे इंसान प्रेम सदभाव की।

याद हैं वो  दिन रिश्ते में गज़ब  मिठास थी।
क्या दौर  क्या दिन अभाव था पर प्यार थी।

क्यों न हो  इंसान की जरूरत ही इंसान थी।
दुख रहे या सुख रिश्ते  सिद्दत से सरीख थी।

खूब याद है कटोरी में  शक्कर  पड़ोस  की।
छोटी  बड़ी  जरूरत  एक  दूसरे इंसान की।

संबंध में खटास न हो  शालीन बने रहते थे।
आपस की जरूरत थी  प्यार  से जी रहे थे।

खतम हो गई  जरूरत  इंसान से इंसान की!
सर्वनाश हो आधुनिक मोबाईल समाज की।

जरूरत  घर  की  आपस  में पूरी होती थी।
घर  की  फरमाईश एक फोन पुरी कर रही।

रही सही कसर आनलाईन शाॅपिंग कर रही।
खतम हो गई जरूरत  इंसान  से इंसान की।

अब  न  स्वार्थ  रहा  और  न  वो  प्यार रहा।
अब न वो इंसान  रहा  और  न समाज रहा।

खतम हो गई जरूरत  इंसान  से इंसान की।
किससे उम्मीद करे इंसान प्रेम सदभाव की।
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कविता का भाव:-
☛याद करता हूँ जब अपने बचपन की हर इंसान हर किसी से जुड़ा हुआ रहता था। जब घरों में कोई शादी विवाह का अवसर होता था तब पड़ोस से काफी सहयोग हुआ करता था। यहाँ तक कि मेहमानों के सुख सुविधा के लिए काफी मदद लिया व किया जाता था। घरों में कोई वस्तु उपलब्ध नहीं रहती थी तो पूर्ति के लिए एक पड़ोसी दूसरे पड़ोसी की मदद सहर्ष बड़े चाव करता था।
☛परन्तु आज का परिवेश पूरी तरह से बदल गया है। आज कोई भी इंसान किसी भी इंसान पर आश्रित या निर्भर नहीं है। या यूँ कह लीजिए इंसान अपने घरों के अधिकांश मामलों में पूर्णतया आत्मनिर्भर है। आधुनिक युग में संसाधन इतना पर्याप्त हो गया है कि पल भर में हर कार्य हर जरूरत पूरी हो जा रही है। 
☛यही कारण है कि इंसान के पास अब कोई बहाना ही नहीं रहा कि वह किसी बहाने पड़ोस में जाए। दूरियाँ बढ़ने लगी है। इंसान के पूराने जीतने मनोरंजन के संसाधन थे सभी समाप्त हो गए। नये दौर में मनोरंजन के सारे संसाधन आज उसके हाथ में हो गए हैं।
☛आज के इस आधुनिक युग में किसी से कुछ पूछने के लिए भी जाना नहीं होता उसके लिए हर हाथ गुगल आ गया है एक क्लिक पर सारी जानकारियाँ कुछ सेकेंड में उपलब्ध हो जा रही है और कोई भी समान आर्डर से घर आ जा रहा है। यह भी वजह है इंसान दूर होता चला जा रहा है।
☛इंसान के जीवन से जुड़ी हर कार्य उसके अपने सोच के अनुसार तमाम भाड़े के संसाधनों के द्वारा पूरे होते जा रहे हैं। सह भागी बनने या बनाने की जरूरत ही नहीं पड़ रही है। जाहिर सी बात है अब हर इंसान को उसके पड़ोस व अपनों की जरूरत ही नहीं रह गयी है।
☛शायद यही वजह है कि इंसान के जेहन में पड़ोस व अपनों के प्रति वो प्रेम, प्यार व स्नेह नहीं रहा। आज हर इंसान पूरी तरह से स्वतंत्र व आजाद है। आज अहसान व दबाव जैसी कोई बात नहीं रह गयी है।
☛उपरोक्त के बावजूद इंसान अगर के परिवेश में तनिक भी सहानुभूति अगर दिल में दूसरों के लिए रखता है तो वह बहुत बड़ी बात है और आज के दौर में ऐसा व्यक्तित्व फिर महान होगा।
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✒.....धीरेन्द्र श्रीवास्तव (हृदय वंदन)






Tuesday, 21 July 2020

कोरोना तेरे काल में...

कोरोना तेरे काल में...
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क्या से क्या हो गया!
कोरोना तेरे काल में...

पहले हम मिलते थे
मरीज से बड़े प्यार से
डर रहा इंसान, इंसान से
हैं दूर आज जग में सभी
इस कोरोना काल में।

मिलते ही खबर कोरोना
इंसान   दूर   हो   रहा!
संवेदना भी दूर इंसान से
क्या से क्या हो गया
कोरोना काल में।

सीने में सहानुभूति
अपने दफ़न हो रही
मानवता दुख में है!
दुखी संसार हो रही
कोरोना काल में।

मिलते ही खबर कोरोना
इंसान   दूर   हो   रहा!
नजदिकियाँ कम थी ही
स्तर और भी गिर रही
कोरोना काल में।

हे बलवीर संकट मोचक
संकट से अब उबार दो
संहार करो दुष्टिनी का
मानवता को संभालो!
कोरोना काल में।

क्या से क्या हो गया!
कोरोना तेरे काल में...
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✒.....धीरेन्द्र श्रीवास्तव (हृदय वंदन)

ससुराल मायका बहू बेटी...

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