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Saturday, 31 July 2021

ओढ़कर धानी चुनरिया...

ओढ़कर धानी चुनरिया...
🍁🍁
उमड़  रही  कारी  बदरिया,
धरती  खुश नाची बदरिया।
सज  गयी  अपनी वसुंधरा,
ओढ़  कर  धानी  चुनरिया।

               जुट  गये  खेतवा केयरिया,
               गउवां में बिटिया जननिया।
               छोटे  बड़े सभी खुश मगन,
               खुशी  मन करे किसनिया।

चल  रही  सावनी बयरिया,
उमड़ घुमड़ बरसे बदरिया।
मगन अपनी प्रकृति हुई है,
ओढ़  कर  धानी चुनरिया।

               पड़  गये अमवा की डरिया,
               झूल रहीं सखियां सहेलियां।
               हंसी  ठिठोली  कर  रही  है,
               ओढ़  कर  धानी  चुनरिया।

सुकून  मिले देखे नजरिया,
रच  गयी  मेहंदी हथेलिया।
खिल  रहा  खेतों में फसल,
ओढ़  कर  धानी  चुनरिया।

🍁🍁
✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

Wednesday, 28 July 2021

सोच का फरक....

सोच का फरक....

🍁🍁
इंसान  का सोच जैसा रहता,
जीवन  उसका  वैसा  रहता।

सही और गलत सब अपना,
असर  उसी के  जैसा रहता।

"जाकी  रही   भावना  जैसी,
प्रभु  मूरत  देखी  तिन तैसी।"

रामायण  में  अपने लिखी है,
याद  रखिये  चौपाई  तुलसी।

जनम  मरण दाता का लेखा,
बना नहीं अमरता का लेखा।

जाना  एक दिन सभी को है,
काट न पाये  मौत का लेखा।

सोच  सदा  इस  बात का हो,
बात  सुन्दर सकारात्मक हो।

सुखद  जिन्दगी  का आधार,
संदेश अच्छा व काम का हो।
🍁🍁
✒......धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

Friday, 23 July 2021

मेरे मन की यह अभिलाषा...


मेरे मन की यह अभिलाषा......!!
🍁🍁
मेरे  मन की यह अभिलाषा।
सुखद सुंदर हो बोली भाषा।
प्यार जहाँ रहे खुशियाँ वहाँ।
जीव जन्तु मानस की भाषा।
मेरे  मन  की यह अभिलाषा.....!!

करते  त्याग आये बड़कपन।
सुख शांति भर जाये जीवन।
जीवन अपने सरल हो जाए।
सुख अपने घर आये आंगन।
मेरे  मन  की यह अभिलाषा.....!!

स्वस्थ सुखी समाज हो जाए।
प्यार मोहब्बत नाज हो जाए।
दुखी  जीवन  कोई भी न हो।
खुशियों के आगाज हो जाए।
मेरे  मन  की यह अभिलाषा.....!!

अकड़  गरूर के भाव न हो।
सुभाव सरल मन घाव न हो।
सहज  संबंध मधुर हो जाए।
विनम्रता  मन रहे ताव न हो।

मेरे  मन  की यह अभिलाषा.....!!
सुखद  सुंदर हो बोली भाषा।
🍁🍁
✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

Thursday, 22 July 2021

शादी का घर.... 😀

शादी का घर....

😀
जमा हुआ था  घर परिवार,
सगे संबंधी प्यारे रिश्तेदार।
वाद्ययन्त्र  रहे  सबके साथ,
जिसका  ज्ञान नहीं थे यार।

भाग दौड़  का समय होता,
रात को ही  बिस्तर पड़ता।
कम  जगह  लोग  जियादा,
5,  6 लोग कमरे में सोता।

वाद्ययंत्र  चालू सबके रहते,
सुर लय ताल में रहे बजते।
हैरान  हुये  सुन गजबे धुन,
लाचारी  में  हम रहे सुनते।

खर्राटा  गजबे   सब  छोड़े,
रगड़ते  जैसे सील पे लोढे।
भों  भा  भाड़  के आवाज,
जैसे  जंग  में छोड़ते गोले।

नासिका निकासिका बोले,
सोया  नहीं  रात पुरा डोले।
रोते दुखड़ा अपना किससे,
सो रहे सब छान कर गोले।

जाग  रहा  फिर  सोते कैसे,
हम  भी  जिद्दी बड़े थे ऐसे।
रात  बिताने  की तब ठानी,
लिख  डाले  दर्द  जैसे तैसे।
😍
✒.....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

Tuesday, 20 July 2021

प्यार की राह...

प्यार की राह...
🍁🍁     
    प्यार से गर
यार  साथ  चलते
    सुखी रहते।
                   समझे नहीं
               बरक्कत  प्यार के
                    दुखी रहते।
    रार से कुछ
नहीं हासिल सिवा
    नफरत के।
                    नफरत से,
              जाने क्यूँ हलकान,
                   वो हैं रहते।
    हरेक काम
मुश्किल न लगते
    सहज होते।
                      गर प्यार है
                 विश्वास है  साथ है
                    खुशी है तभी। 
     हरेक राह
कामयाबी के होते
  प्यार के होते।
🍁🍁
✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

Saturday, 19 June 2021

आम है राजा...

आम है राजा..
🍁🍁
आम  फलों  का  होता  राजा,
अइसहीं  नहीं  सब को भाता।

गुदा   तो   होता  सबसे  जुदा,
मजा  गुठली चुसने  में आता।
~~
मुँह  में  डार  निकार  चुसाता,
गजबे  स्वाद चुसने  में आता।

स्वाद  गजबे  मजा भी गजबे,
रोज  खवाता मन न अघाता।
~~
स्वाद में शहंशाह आम राजा,
गुण से अपने कहलाता राजा।

अनोखे  स्वाद का वह स्वामी,
तभी तो सबके मन का राजा।
🍁🍁
✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

Thursday, 17 June 2021

बरसे बदरी...

बरसे बदरी...
🌧🌧
बरसे    बदरी  भोरहरी  से,
तर भयी मौसम सबही के।

ऐसी बारिस  हो रही आज,
गोताए   सबही   घरही  में।

प्रकृति  जन  खुश हैं आज,
जीव  जगत  सबको लाभ।

चाय पकौड़ा सांझ के बेला,
स्वाद  मिले खाए के आज।

गर्मी  से  राहत  मिल  जाये,
ज्येष्ठ  जोर  लगा कर बरसे।

बाद आषाढ़ की आए बारी,
उहे  सम्हारी  खेत  कियारी।
🌧🌧
✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

Sunday, 13 June 2021

वक्त महान....

वक्त महान....
🍁🍁
         वक्त  ही  महान  होता,
         वक्त  से  जहांन होता।
         वक्त के विरूद्ध इंसान,
         बेबस   लाचार   होता।
खुशी कभी गम होता,
दिन  रात  तम  होता।
सुख दुख  परेशानियां,
दस्तूर   विधान  होता।
         हमें  आप  यह लगता,
         गलती  इंसान  करता।
         समझ  सके हम आप,
         यही  नहीं ज्ञान होता।
वक्त अगर साथ होता,
गधा  पहलवान होता।
जिन्दगी  के  राह  का,
बंदा  शक्तिमान होता।
🍁🍁
☛...#हृदयवंदन
✒.....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

Saturday, 12 June 2021

मान देना....

।।मुक्तक।।  मान देना....
🍁🍁
मान  देना  सरल नहीं होता,
मन  छोटा  महसूस  करता।
मुक्त होता  जो इन सोचों से,
जीवन तभी  स्वछंद  होता।

शक  शंका  होता दुखकारी,
प्यार  मोहब्बत  तोड़े  यारी।
खुशियों  के  होते हैं नाशक,
दुख  दर्द  के  वाहक  भारी।

शक  शंका  दुखी मन वासी,
सुखी  मन  रहे  दूर  उदासी।
बुद्धि विवेक साथ जो अपने,
मधुरता ऐसी जैसे मधुमासी।

दुख अपना सबसे नहीं रोना,
दर्द  और अपनी बढ़ जाना। 
रखना नहीं उम्मीद किसी से,
मिले साथ तो आदर करना।
🍁🍁☛....#हृदयवंदन
✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

Friday, 11 June 2021

कुछ तो रहम कर दो....

कुछ तो रहम कर दो....
🍁🙏🍁
प्रभु बड़ा तरस आता, साथ  कुछ  नहीं जाता...
कुछ  तो  रहम  कर  दो,
कमाई साथ ले जाने दो।
लुटे माल साथ ले जाता,
डीजिटल  ही करवा दो।
कुछ  तो  रहम  कर  दो!
प्रभु बड़ा तरस आता, साथ कुछ नहीं जाता...
ईमान  धरम त्याग देता,
इंसान क्या नहीं करता।
चोरी  चमारी  लुट  पाट,
जलालत  झेल   जाता।
कुछ  तो  रहम  कर  दो!
प्रभु बड़ा तरस आता, साथ कुछ नहीं जाता...
बेइमान  मक्कार  बनता,
गद्दारी  तक  कर जाता।
छल  कपट  झूठ  फरेब,
सब  अपने लिए करता।
कुछ  तो  रहम  कर  दो!
प्रभु बड़ा तरस आता, साथ कुछ नहीं जाता...
जिन्दगी   भर   जुझता,
पर  हासिल क्या होता।
होता तो काल का ग्रास,
अपने साथ क्या जाता।
कुछ  तो  रहम  कर  दो!
प्रभु बड़ा तरस आता, साथ कुछ नहीं जाता...
🍁🍁
✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

ससुराल मायका बहू बेटी...

ससुराल मायका बहू बेटी... 🍁🍁   ससुराल मायका बहू बेटी! दोनों जहान आबाद करती। मायके से ट्यूशन गर लिया, दुखों का जाल बिछा लेती। जहां कभ...