🤯"फैशन"🤯
फैशन बहुत जंजाल बड़ा है,
कपड़ों का आकाल पड़ा है।
हाल देखो अपने कुमारों का,
कटे फटे में भौकाल तड़ा है।
--
फैशन का तो ऐसा लफड़ा है,
नंगा पन तन को जकड़ा है।
पश्चिमी सभ्यता के लपेट में,
देश सनातन जड़से उखड़ा है।
--
फैशन में हर इंसान पड़ा है,
झुकने में स्वाभिमान अड़ा है।
छोटे कर दिए संबंधों के नाम,
गौरवान्वित बुद्धिमान तड़ा हैं।
--
नमस्ते प्रणाम नहीं कहना है,
हेलो हाय बाय ही कहना है।
खत्म अदब लिहाज संस्कार,
फैशन में ये सब भी सहना है।
"धीर"
स्वचिन्तन व मनन से हृदय की गहराईयों से उत्पन्न शब्दों को कविता व लेख से "My Heart" के माध्यम से सत्य, सार्थक, चेतनाप्रद, शिक्षाप्रद विचारों को सहृदय आपके के समक्ष प्रस्तुत करना हमारा ध्येय है। सहृदय आभार! धन्यवाद।
Wednesday, 21 December 2022
Wednesday, 26 October 2022
शाम का मिजाज...
"संगताना दो मित्र का उनके बीच बातचीत का"
जिस पर मेरा प्रयास...!!
शाम का मिजाज...
😍
मौसम भी आज मौका भी है,
फुर्सत में आज लम्हा भी है।
चलो मस्ती में हम खो जाएं,
तीन गिलास एक खम्भा भी है।
सांझ ढ़ले एक मित्र भी आए,
काजू बादाम चखना ले आए।
ऐसे तो मौज कहां जीवन में,
आज मस्ताना शाम हो जाए।
दूर कहीं नहीं और बैैठना है,
आड़ झाड़ कहीं बैठ लेना है।
मस्ती में कहीं रोड़ा नहीं आए,
इसका ख्याल पहले करना है।
"धीर"
खम्भा= शराब की बोतल।
रोड़ा = पत्नी।
#हृदयवंदन
Sunday, 16 October 2022
झगड़ा और रगड़ा
जब साथ साथ रहना है,
तब बोलो झगड़ा कैसा।
जब साथ नहीं रहना है,
तब बोलो झगड़ा कैसा।
कुछ नहीं लेना देना है,
तब बोलो झगड़ा कैसा।
खुद खाना खुद पीना है,
तब बोलो झगड़ा कैसा।
अगर फिर भी झगड़ा है,
झगड़ा नहीं ये रगड़ा है।
बात बिल्कुल है पक्का,
दीमाग सनका तगड़ा है।
Wednesday, 2 February 2022
राष्ट्रवाद के पग...
राष्ट्रवाद के पग....
🍁🍁
राष्ट्रवाद के पग चलना है,
राष्ट्र सशक्त हमें करना है।
बनेगा अपना राष्ट्र सशक्त,
हमें ऐसे ही कर्म करना है।
नहीं चापलुसी हमें करना,
नहीं राजनीति हमें करना।
राष्ट्रवाद मेरी प्राथमिकता,
इसी से प्रीति हमें करना।
राष्ट्रवाद के लिए समर्पण,
तनमन उनके लिए अर्पण।
सुख शांति अमन चैन का,
सुन्दर यही सबसे दर्पण।
राष्ट्र धर्म का ज्ञान नहीं है,
इंसान नहीं शैतान वही है।
उसे परखना दूर करोना,
जयचंद बड़े जान वही हैं।
🍁🍁
✒.....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"
#हृदयवंदन
Friday, 1 October 2021
राष्ट्रीय जयचंद.....
राष्ट्रीय जयचंद.....
🍁🍁
राष्ट्रीय जयचंद बेरोजगार हो गये।
नंग धड़ंग और गुनहगार हो गये।।
दसों अंगुली घी में कभी थे जिनके।
आज बेनकाब सब बेकार हो गये।।
भटक रहे दर दर गुमराह कर रहे।
दरिंदगी खुल कर सरेराह कर रहे।।
खुद को बेगुनाह बताने के लिए।
उपद्रवी और भी गुनाह कर रहे।।
भाय भतिजा भांजा जहान उनका।
राष्ट्र हित में नहीं योगदान उनका।।
अपना हित साधे भाड़ में जाय राधे,
सिद्धांत योगदान है महान उनका।।
🍁🍁
✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव"धीर"
Monday, 27 September 2021
योग दिवस....
योग दिवस....
🍁🍁
रखती सबकी निरोगी काया,
योग को जिसने अपनाया।
स्वस्थ सुखी समाज बनाती,
धन होने नहीं देती जाया।
चाहिए हमें गर रोगों से दूरी,
योग से करनी भक्ति पूरी।
खाया पिया सहज पचाया,
स्वस्थ पाचन से शक्ति पूरी।
आधुनिकता की माया अंधी,
मन तो मन करे काया गंदी।
श्रम शक्ति पर कर रही वार,
होत आलसी मानुष समाज।
योग जीवन सुख का आधार,
बच्चा बुढ़ा सब पाए लाभ।
स्वस्थ शरीर बने तेज दिमाग,
जन जन तभी बने खुशहाल।
🍁🍁
✒......धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"
Friday, 24 September 2021
मुक्तक
मुक्तक
🍁🍁उड़ान भावना का विधान पर न जाइए।
होगी जरूर गलती हमें आप बताइए।।
पेशे से वकील करोना ने बनाया कवि।
अबोध, आप दिग्गजों में समझ जाइए।।
जिन पर कृपा राम रघुराई,
पत्थर भी सागर में उतराई।
राम नाम जीवन का आधार,
भवसागर पार राम कराई।
प्रेम की धारा बहे दिल में।
चर्चा उनके होते महफिल में।।
सुन्दर मन विवेक उनके होते।
चहेते बन रहते हर दिल में।।
हिन्दुत्व का है सशक्त आधार।
सनातन संस्कृति व संस्कार।।
धरम करम से अगर कतराए।
खतम होगें हिन्दुत्व जनाधार।।
अच्छा बर्ताव में संकोच होता।
बुरा बर्ताव नि:संकोच होता।।
इंसान गलत आदत में रमा है।
सुकून उसी में संतोष होता।।
परिवार में खुशियां प्यार से है।
तकरार से नहीं त्याग से है।।
नहीं समझता इंसान इसको।
दूर त्याग और प्यार से है।।
चुभने लगे जब कोई किसी को,
लड़ने से अच्छा है दूरी कर लो।
तकरार रार से कुछ न मिलेगा,
सुख चैन अपनी खुशी हरेगा।
खुद में ही खुशियों का सादर,
दर दर भटके लेकर गागर।
इंसान का स्वभाव यही है,
जैसे कस्तूरी ढ़ूढ़े मृग बाहर।
राम को पूजा कृष्ण को पूजा,
आयी नवरात्रि माँ को पूजा।
अपनी जननी जनक उपेक्षित,
फल क्या देगा तुम को पूजा।
🍁🍁
✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव"धीर"
कवि मन....
कवि मन...
🍁🍁
न पूछो कवि मन कहां कहां है,पहुँचे न रवि जहां वहां वहां है।
सुक्ष्म से सुक्ष्म शिखर से ऊपर।
सोच न पाये कोई जहां जहां है।
न पूछो कवि मन कहां कहां है,
पहुँचे न रवि जहां वहां वहां है।
जीवन के अनछुए अनकहे पल,
शब्दों को सूत्र में गढ़ता है पल।
अच्छाई सच्चाई और सुख दुख,
उजागर करता वो हर एक पल।
न पूछो कवि मन कहां कहां है,
पहुँचे न रवि जहां वहां वहां है।
🍁🍁
✒.....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"
Sunday, 19 September 2021
जाने नज़र को क्या हुआ...?
जाने नज़र को क्या हुआ...?
🍁🍁
अबोध बचपना जब होती थी।
माँ दुनिया जिंदगी होती थी।।
दहल जाता था घर रुदन से।
माँ नज़रों से ओझल होती थी।।
अब नजर वैसा नजर कहां है।
बदल गया वैसा असर कहां है।।
बेबस दुखी लाचार हुई ममता।
दुख इससे और इतर कहां है।।
सर्वस त्याग पालन करे जिसका।
आज वही अपमान करे उसका।।
माँ जननी वरदान ईश्वर की।
क्या आदर ऐसा करे उसका।।
सृष्टि की मां आधार होती है।
ईश्वर की मां अराध्य होती है।।
धरम करम बेकार होगा करना।
जब उपेक्षित तिरस्कार होती है।।
🍁🍁
✒.....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"
🍁🍁
अबोध बचपना जब होती थी।
माँ दुनिया जिंदगी होती थी।।
दहल जाता था घर रुदन से।
माँ नज़रों से ओझल होती थी।।
अब नजर वैसा नजर कहां है।
बदल गया वैसा असर कहां है।।
बेबस दुखी लाचार हुई ममता।
दुख इससे और इतर कहां है।।
सर्वस त्याग पालन करे जिसका।
आज वही अपमान करे उसका।।
माँ जननी वरदान ईश्वर की।
क्या आदर ऐसा करे उसका।।
सृष्टि की मां आधार होती है।
ईश्वर की मां अराध्य होती है।।
धरम करम बेकार होगा करना।
जब उपेक्षित तिरस्कार होती है।।
🍁🍁
✒.....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"
Sunday, 12 September 2021
वो भी क्या दिन थे...?
वो भी क्या दिन थे....?
🍁🍁
उन दिनों की बात थी,
घर में ऐसी शाम थी।
रिश्तों में थी जिंदगी,
जिंदगी खुश हाल थी।
किलकारियां थी शोर था,
बच्चे बुढ़ों का दौर था।
स्नेह प्यार लगाव का,
ऐसा सशक्त डोर था।
ऐसा नया दौर हुआ,
मायने ही और हुआ।
कड़वाहट नफरतों का
जिंदगी में ठौर हुआ।
सबके सब अपने में है,
सबके सब सपने में है।
हंसती खेलती जिंदगी,
अब तो बस सुुनने में है।
🍁🍁
✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"
🍁🍁
उन दिनों की बात थी,
घर में ऐसी शाम थी।
रिश्तों में थी जिंदगी,
जिंदगी खुश हाल थी।
किलकारियां थी शोर था,
बच्चे बुढ़ों का दौर था।
स्नेह प्यार लगाव का,
ऐसा सशक्त डोर था।
ऐसा नया दौर हुआ,
मायने ही और हुआ।
कड़वाहट नफरतों का
जिंदगी में ठौर हुआ।
सबके सब अपने में है,
सबके सब सपने में है।
हंसती खेलती जिंदगी,
अब तो बस सुुनने में है।
🍁🍁
✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"
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