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Sunday, 28 June 2020

माँ अकल्पनीय है!!

माँ अकल्पनीय है!!
🍁
तेरी  ही  रचना  हूँ  माते,
तुझ पे लिखूँ शब्द नहीं।
माँ जननी है जन्नत है
लक्ष्मी  है  सरस्वती है
शक्ति और अन्नपूर्णा है
माँ प्यार  है माँ दुलार हैं
ममता की पूर्ण संसार है
माँ जीवन की पतवार है
जीवन सुख की धार है
माँ प्यार की गागर है
सिन्धू है सागर है
आँचल में स्वर्ग है
माँ गुरू है ज्ञान है
मुश्किल में ढ़ाल है
दिपक है प्रकाश है
पूजा है आराधना है
कामना है  इबादत है
माँ ढ़ांढ़स है हिम्मत है
वंदनीय  है  पूजनीय है
अद्भूत  अकल्पनीय  है
ईश्वर  भी  नतमस्तक  है
माँ जैसी है आदरणीय है
माँ कोटि कोटि  प्रणाम है
🍁
है  दुर्भाग्य  ऐसे  पुत्र  का,
माँ बेबस अगर लाचार है।
🍁🍁
✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"


Friday, 26 June 2020

फिक्र अपनों का कद्र करता चल।


फिक्र अपनों का कद्र करता चल।
♨♨
अपने हैं फिक्र में हर वक्त रहते हैं!
फिक्र अपनों का कद्र करता चल।

तड़प क्यों न हो स्नेह जो करते हैं!
उन्हें भरोसा हो आगाज़ देता चल।

जो प्रेम करते हैं वही चाह रखते हैं!
उनके चाहत को गले लगाता चल।

कामयाबी यहाँ संघर्ष से मिलती है!
न सोच न रूक  संघर्ष करता चल।

अपने हैं हैसियत बखूबी जानते हैं!
उनका आशीष लेकर चलता चल।

साथ रख दुशवारियाँ न ले उनका!
तुझे कामयाब देखेंगे  चलता चल।

अपने हैं फिक्र में हर वक्त रहते हैं!
फिक्र अपनों का कद्र करता चल।
♨♨
✒......धीरेन्द्र श्रीवास्तव (हृदय वंदन)


Thursday, 25 June 2020

यशस्वी प्रधानमंत्री मोदी जी.....


जन्म दिन की असीम शुभकामना  हार्दिक बधाई!! 🙏
🍁🍁
जनम दिन के पावन दिन राष्ट्र शिल्पी को नमन हमारा।
ईश्वर की कृपा तुझ पर हो  गौरवान्वित  है देश हमारा।।
तेरी महिमा सूझ बूझ का गुणगान करें कोई शब्द नहीं।
सूरज को दीप दिखाने जैसा  शान में तेरे शब्द हमारा।।

सन् चौदह में काशी आये धन्य काशी  गंगा पुत्र पाया।
बहुत आये  देश  में  सेवक  पर  तेरे जैसा नहीं आया।।
कायल  देश कायल जनता तुझे पाकर गौरवान्वित है।
जिसने सुंदर राष्ट्र बनाया  देश  ने सच्चा सेवक पाया।।

साहसिक सशक्त फैसलों से जग अचंभित कर डाला।
जिन मुद्दो पर जयचंदों ने वोट की रोटियां सेंक डाला।।
इतनी सरलता से खत्म होगा विश्वास नहीं  यह  होता।
डरे सहमे 370, मंदिर पर जबरन विवाद बना डाला।।

यही सोचना है सबको, हिन्दू मुस्लिम विवाद नहीं था।
मानवता का जो है पूजारी  विवादों से नाता नहीं था।।
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख ईसाई  सबको समान समझता।
जयचंदों की सोची समझी सब वोट की राजनीति था।।
🍁🍁
✒.......धीरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव"धीर"



Wednesday, 24 June 2020

माँ शारदे विनती मेरी स्वीकार ले....


माँ शारदे विनती मेरी स्वीकार ले...
🙏⚘🙏
माँ शारदे! माँ शारदे, विनती मेरी तु स्वीकार ले।
तेरे  शरण  में  हूँ मैं माता
कृपा से अपनी नवाज दे।
माँ कर  कृपा तु बस यही
लिखूँ  पढूँ  तु  संवार  दे।
माँ शारदे! माँ शारदे, विनती मेरी तु स्वीकार ले।

तेरी कृपा से सिद्धि होते
बुद्धि  ज्ञान  को  धार दे।
कामना यही है  माँ मेरी
जन जन ज्ञान धनवान हो।
मन में  ज्ञान  प्रकाश हो
आशीष  माता  चाहिए।
माँ शारदे! माँ शारदे, विनती मेरी तु स्वीकार ले।

बुद्धि  दे  माँ  ज्ञान  दे माँ
जग में हूँ  कुछ कर सकूँ।
बुद्धि ज्ञान विवेक अपना
सब  माता  तेरे  हवाले।
बालक हूँ तेरा माँ तु मेरी
जीवन  मेरा  तु संवार दे।
माँ शारदे!  माँ शारदे,  विनती मेरी तु स्वीकार ले।
⚘🙏⚘
✒......धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"



Tuesday, 23 June 2020

न्यायालय हो तो घर जैसा.....

न्यायालय हो तो घर जैसा.....
♨♨
न्यायालय हो तो मेरे घर व घरैतिन जैसा!
अपराधी तु वकील तु जज भी तुम्ही हो।

गलतियाँ करके फैसला खूद ले लेती हो!
दूरी बनाने का सजा खूद ही दे देती हो।

घर जैसा न्यायालय संसार में नहीं होता है!
जो निर्दोष है उसे गुनहगार बना देती हो।

सजा ऐसा दोषी को सुनाया भी न जाए!
मियाद कितना निर्दोष को बताया न जाए।

वाह रे न्यायपालिका जवाब नहीं है तेरा!
फैसला होता मगर अपील नहीं होती है।

न पूछो कसम से दोष में मजे भी जमके!
जीवन में इसका अलग ही तरंग होता है।

न्यायालय हो तो मेरे घर व घरैतीन जैसा!
मिनटों में निर्दोष को दोषी करार देती हो।

गुनहगार नहीं फिर भी बोल नहीं सकता!
जैसी भी हो बहुत प्यारी है न्यायपालिका।

वाह रे न्यायपालिका जवाब नहीं है तेरा!
फैसला होता मगर अपील नहीं होता है।
♨♨
✒.....धीरेन्द्र श्रीवास्तव (हृदय वंदन)




Sunday, 21 June 2020

बन जाना चाहे कलेक्टर.....

बन जाना चाह कलेक्टर.....
♨♨
चाहे बन जाना कलेक्टर, अपनों बीच छोटे रहना।
पद प्रतिष्ठा मिल जाए, अभिमान कभी न करना।।

युवा आज पढ़ लिख कर, काबिल बन तो रहा है।
पर अच्छा बिलकुल नहीं, अभिमानी बन रहा है।।

जिन्दगी  का  जब  अपने, भरोसा  नहीं  रहा  है।
क्यों रहते मगरूर इतने, गुरूर रावण नहीं रहा है।।

जहाँ जो जैसा रहता हो, व्यवहार वैसा ही करना।
वहाँ योग्यता का अपने, दिखावा कभी न करना।।

शालीनता  सबको  भाता,  मृदभाषी  बन  रहना।
हृदय में होगा तेरा स्थान, तीखे वचन न कहना।।

बुद्धिमता का प्रदर्शन, बिना जरूरत नहीं करना।
जिन्दगी में बढ़े सौम्यता, पहचान इसकी करना।।

सुखी जिन्दगी की नैय्या, व्यवहार ही है खेवईया।
जीवन डगमग जब होता, करेगी पार यही भईया।।

याद हमें बस यही रखना, मूल से जुड़ कर रहना।
रहेगा सुन्दर तन मन, जहान का सुन्दर बनना।।

चाहे बन जाना कलेक्टर, अपनों बीच छोटे रहना।
पद प्रतिष्ठा मिल जाए, अभिमान कभी न करना।।
♨♨
myheart1971.blogspot.com
✒...... धीरेन्द श्रीवास्तव "धीर"



Friday, 19 June 2020

गाली कऽ कई रूप है भईया।

गाली कऽ कई रूप है भईया
😃💖
गाली कऽ कई रूप है भईया
कहा तऽ तोहें सुनाई हो....

मनवा तोहसे जुड़ल रहेला
टोके से तु बाज न आवेला
बिना बुद्धि क बात करेला
एही से गदहवन पसंद आवेलन
दिमाग आपन खूब दौड़ावेला
नियमवो क ध्यान रखबा हो
बतावा अब तोहें के पढ़ाई।

गाली कऽ कई रूप है भईया
कहा तऽ तोहें सुनाई हो....

भीतरी गाली व बहरी गाली
डिपेण्ड करेला कईसन हौवऽ
हौवा मजबूत भीतरिए गरियाईब
कमजोरी पे बहरी जोर चिल्लाईब हो
ईज्जत हौव न बचल रहिया भईया
कौनों काम कौनों बात ऐसन न करिह
भीतरी बहरी गरिया के कोई जाई हो।

गाली कऽ कई रूप है भईया
कहा तऽ तोहें सुनाई हो....

लोकतंत्र हौव, चपले रहा कोपतंत्र
एम्मन तनिखों नाही मनाहीं हौव।
दिमाग देहलन भगवान हो भईया
ओकर लाज तऽ बचाईं हो
मानुष हौव भीतरे ईश्वर
ओन्हे जिन बहरियाईं हो
गरिमा ओनके बढ़ाईं हो....

गाली कऽ कई रूप है भईया
कहा तऽ तोहें सुनाई हो....

कुल खेला जबनिए क हौव
कोशिश करीं, माला तोहें पहनाईब हो।
♨♨
उपरोक्त पंक्तियों का भाव:-
☛उपरोक्त पंक्तियों को व्यंग्यात्मक तौर से रचित है। अज्ञानता और नफ़रत दोनों अगर किसी इंसान के अन्दर मौजूद है तो उसे देशी कहावत से बखूबी समझ जायेंगे "एक तऽ तित लौकी दूजे नीमी पर" अर्थात अज्ञानता तो विषाक्त तो है ही नफ़रत जूड़ जाए तो महा विनाशक हो जाएगा।
☛उपरोक्त अवगुण इंसान को हर तरह से संकूचित व विनाश करता है साथ ही समाज को भी क्षति पहूँचाता है। क्योंकि हर बात व कार्य में सकारात्मक व रचनात्मक दृष्टिकोण व रवैया अपनाने में अक्षम होते हैं।
☛ऐसे व्यक्ति समस्या उत्पन्न होने पर उसके निराकरण व प्रतिकूल स्थितियों में अपने को व्यवस्थित करने व उसमें ढ़लने पर तनिक भी नहीं सोचते। उनका संकल्प सिर्फ विरोध और उलाहना पर केन्द्रित हो जाता।
✒...... धीरेन्द्र  श्रीवास्तव (हृदय वंदन)




Thursday, 18 June 2020

नफ़रत का परिणाम...

  नफ़रत का परिणाम...
♨♨
नफ़रत से कुछ भी हासिल न होगा....
चाहे जोर आजमाईश जितना भी कर लो।

नफ़रत का बीज जेहन में डाल कर देखना
रातों की नींद हराम न हो जाए तो कहना
पागल दिमाग न हो जाए तो  कहना
अपना पराया न हो जाए तो कहना
चेहरा कुरूप न हो जाए तो कहना
ब्लड संतुलन बिगड़ न जाय तो कहना।

नफ़रत से कुछ भी हासिल न होगा....
चाहे जोर आजमाईश जितना भी कर लो।

नफ़रत से हासिल क्या होगा इसे भी समझो
गलत बोल अपने ही सपनों को चूर करेगी
नफ़रत तुम करोगे अपनों से दूर होगे
पालो न भरम अपने दिलों दिमाग में
नफ़रत में इंसान तबाही ही गढ़ता
रातों की नींद दिन का सुकून ही हरता।

नफ़रत से कुछ भी हासिल न होगा....
चाहे जोर आजमाईश जितना भी कर लो।

रातों को करवट बदलने से तो अच्छा
झूठा ही सही पर गुड नाईट बोलना
नफ़रत स्वभाव में ज़हर घोल देती
छुएगी जभी असर बुरा ही करेगी
नफ़रत जहरीला धुँआ ही समझना
जबतक रहेगी परेशान करती रहेगी।

नफ़रत से कुछ भी हासिल न होगा....
चाहे जोर आजमाईश जितना भी कर लो।

माना कि कमियाँ बताना भी जायज होता
पर जो सही है जायज है अच्छा करे है
उसका प्रोत्साहन व उत्साह बढ़ाओ
गलतियां को रोको सही को बढ़ाओ
सही का खिलाफ़त कर क्या पाओगे
नफ़रत को समझो और कारण पहचानों।

नफ़रत से कुछ भी हासिल न होगा....
चाहे जोर आजमाईश जितना भी कर लो।
♨♨
कविता का भाव :-
☛नफ़रत बहुत ही विचित्र समस्या है जिसका प्रादुर्भाव इंसान के दिल व दिमाग से ही होता है। नफ़रत का अपना कोई  मानक नहीं होता यह इंसान के स्वयं के मनःस्थिति पर निर्भर करती है।
☛इसके जद में जो भी आता समझो स्वयं के पतन का मार्ग प्रशस्त कर लेता है क्योंकि नफ़रत की विशेषता ही ऐसी है जो बुराईयों पर आतुर व ललाईत रहती है। इंसान सदैव बुराईयों के बीच अपने को रखता और वैसा ही अपने आचार विचार व स्वभाव को बना लेता।
☛परिणामस्वरूप नफ़रत में इंसान अच्छाईयों से विमुख होता चला जाता तत्पश्चात जीवन में कुरूपता का होना स्वभाविक है।
♨♨
✒......धीरेन्द्र श्रीवास्तव (हृदय वंदन)



Monday, 15 June 2020

सुशांत तुम क्यों शान्त हो गए.......

सुशांत तुम क्यों शान्त हुए....

(पिछले वर्ष की रचना)
🌹🌹
कलाकार  जीवन खूब होता,
दर्द  छुपाए खुशियां  बाटता।
ईज्जत शोहरत कद सम्मान,
चारचाँद  जीवन  में लगाता।
जीवन में दुखी सवाल दे गए, क्यों तुम ऐसे शान्त हो गए..?

तुम  सुशांत श्रेष्ठ अदाकार थे,
युवा  प्रेरणा  स्रोत आधार थे।
तेरी  छवि  हर एक अदा पर,
रहते फिदा युवा अपनाते थे।
जीवन में दुखी सवाल दे गए, क्यों तुम ऐसे शान्त हो गए..?

ऐसा क्या था खामोश हो गए,
इतने  कमजोर  कैसे हो गए।
विश्वास  बिलकुल नहीं होता,
स्नेह प्यार पर  पाप कर गए।
जीवन में दुखी सवाल दे गए, क्यों तुम ऐसे शान्त हो गए..?

मौत की आहट  से मन कांपे,
तुमने  सहज  ही गले लगाए।
कैसी वेदना मौत सरल लगा,
था दर्द कैसा कायर बन गए।
जीवन में दुखी सवाल दे गए, क्यों तुम ऐसे शान्त हो गए..?

किसी के बेटे  भाई किसी के,
चहेते सभी के प्यारे सभी के।
तुझे याद नहीं आई मोहब्बत,
तुमसे  जोड़ संजोए थे सपने।
जीवन में दुखी सवाल दे गए, क्यों तुम ऐसे शान्त हो गए..?

मालूम  है  अब  तुम  नहीं रहे,
कसक है विश्वास नहीं हो रहे।
अपनों  के  जज्बात  स्नेह को,
जीते जी तुम सबको मार गए।
जीवन में दुखी सवाल दे गए, क्यों तुम ऐसे शान्त हो गए..? 15/06/2020
🍁🍁
✒.....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

Sunday, 14 June 2020

चलो कुंवारे में घूम आयें.....

चलो कुंवारे में घूम आयें.....
💝💝
वो  भी  अपने  क्या  दिन थे,
जब   कुंवारे  हम  अपने  थे।
सुखहारा आज गम का मारा,
कैसे   खुश   रहता   बेचारा।
बैठे   बैठे    मन   में   आया,
सुखद अतीत में घूम आया।
अपने  कुंवारे से मिल आया,
हर्षित  मन  गम दूर भगाया।
           कुंवारे    वाले   दिन  अपने,
           ख्वाब  में भी नजर न आते।
           डका  पचासा  हैरान तब से,
           बच्चे  अपने जवान  जब से।
           कुंवारे  में  गया  न  कब  से,
           चलो  कुंवारे  में  घूम  आयें।
           कहते हैं मन बूढ़ा नहीं होता, 
           तब मन उमंग  क्यों न होता।
हम कुंवारे जवानी में झांके,
हर  एक बाल काले घने थे।
योगभ्यास प्राणायाम करते,
चमके चेहरा पाॅलिश करते।
कपड़े  में  कीरिच रहता था,
आइने  से  लगाव बहुत था।
सिनेमा  देख कर आता था,
हीरो  बना  घूमा करता था।
           वो भी क्या दिन अपना था!
           सच लगता सारा सपना था।
           मिथुन गोविन्दा अनिल की,
           स्टाईल अपनी भी होती थी।
           जूही, माधुरी, और श्री देवी,
           ख्वाब  में  अपने  होती थी।
           बिसर   गये  अपने  वो दिन,
           लुगाई  अब प्यारी इन दिन।
अफसोस  नहीं  उमंग  नहीं,
समय  के  साथ सब है सही।
डाई  होता  न  अब  पाॅलिश,
वास्तविकता बनी  ख्वाहिश।
खुश  रहता  वो  उमंग  नहीं,
स्वर्ग   अपनी  दुनियां  यही।
तन  मन  तब  खुश हो जाये,
चलो  कुंवारे  में  घूम  आयें।
💖💖
✒......धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

ससुराल मायका बहू बेटी...

ससुराल मायका बहू बेटी... 🍁🍁   ससुराल मायका बहू बेटी! दोनों जहान आबाद करती। मायके से ट्यूशन गर लिया, दुखों का जाल बिछा लेती। जहां कभ...