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Monday, 18 May 2020

किसे दोषी कहूँ....

किसे दोषी कहूँ....
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क्या करूँ; किसे दोषी कहूँ?
मानव को दोषी कहूँ या 
ईश्वर को दोषी कहूँ या फिर
सरकारों को दोषी कहूँ
मानवता आज है संकट में
कोरोना क्या तेरा दोष नहीं?
~
मानव की विचित्र धारणा!
झट विश्वास है डिग जाता।
पल में तोला पल में माशा!
कितने रंग ढ़ंग बदल लेता!
माँगने की चाहत जब होती
प्रभू समक्ष याचक बन जाता।
~
कभी आस्तिक बना रहता
पल में नास्तिक बन जाता
ईश्वर को न मानता न सूनता
जब संकट में घिर जाता।
कोई गद्दार कुछ कह देता
ईश्वर को भी झूठाला देता।
~
रामयण में तमाम प्रसंग रहे
पागल थे वो जो रच डाले।
युगों पुरानी प्रभू की गाथा!
धीरज धरे जो पार हो जाता
क्या पढ़ते क्या सूनते हो
घर घर में ही बाचा जाता।
~
तरस आता भक्ति भाव पर!
खुद मानव खुद को छलता!
जब रहता सत्संग पूजा में
बस हाथ जोड़े बैठा रहता!
मन का पूछो कहाँ लगा था
शातिर गुणा गणित में रहता।
~
भक्ति भाव अब नहीं है प्यारे
पंडित ध्यान दक्षिना में यारे
पूजा शीघ्र खतम कर भागे!
आगे आऊर जजमानी थामे।
भक्त तो याचक बना बैठा है
बीच के सारे भजन भूला के।
~
संकट के इस आलम में कैसे!
मानव धैर्य विहिन बन जाता!
ईश्वर की आस्था को छोड़ा!
व्याकुल नीज घर भाग रहा
नहीं भरोसा उसे किसी पर!
गद्दारों ने मानवता जो लूटा।
~
बैठे सियासत की गद्दी पर
उनको बस गद्दी से नाता
मानवता की छाती चढ़ कर
बस सियासत ही चमकाना
तनिक सोचते राज्य गद्दारों
यूँ मानवता परेशान न होती।
~
पीड़ा सबकी सहन न होती
मन खुद से यही सवाल करें!
मानवता इतनी है संकट में
हर जन मन व्यथित हो रहा
खाने दाने को लाले पड़ गए
भटकने को क्यों मजबूर इंसान?
~
क्या करूँ; किसे दोषी कहूँ?
मानव को दोषी कहूँ या
ईश्वर को दोषी कहूँ या फिर
सरकारों को दोषी कहूँ
मानवता आज है संकट में
कोरोना क्या तेरा दोष नहीं?
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✒......धीरेन्द्र श्रीवास्तव (हृदय वंदन)

एक चूक जीवन का शूल


एक चूक जीवन का शूल...
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इंसान के दिमाग की दो अवस्था होती प्रथम शान्तचित्त व दूसरा विकृतचित्त

अगर इंसान का दिमाग शान्तचित्त पर फोकस करता तो उसका जीवन थोड़े में ही सुखमय, सहज, सरल, सौम्य व शान्त बन जाता है।

अगर इंसान का दिमाग विकृतचित्त पर फोकस करता तो उसका जीवन सारी व्यवस्थाएं रहने के बावजूद दुखमय, असहज, कठीन, असौम्य व अशान्त बन जाता है।

अक्सर इंसान के जीवन में अपनों के द्वारा या दीगर से ऐसी बात सुनने को मिलती है जो अपने स्वभाव से तनिक भी मेल नहीं खाती जो हमें विचलित व आक्रोशित कर देती है और तुरंत इंसान के मानसिक स्थिति दिमाग को बदल देती है।

कभी कभी इंसान उसी अवस्था में तुरन्त गलत फैसले कर अपने जीवन में बहुत बड़ा नुकसान भी कर बैठता है; कुछ फैसले तो ऐसे कर लेता है कि उससे पछताने के सिवाय और कोई दूसरा कोई माध्यम ही नहीं होता।

अगर उसी क्षण इंसान अपने जीवित विवेकी दिमाग से सहजता से बातों को समझे और उसकी बारिकियों पर मनन करें तो उसका खूद का वही दिमाग एक दूसरा पहलू व मतलब प्रस्तुत करता है जो उसे सुख देता तथा संतोष का आभास कराता और तब खूद को यह अहसास भी होता है कि अरे ऐसा भी हो सकता है।

दिमाग वही है लेकिन चतुर व समझदारी से वह उसमें एक सुखद अवसर भी ढ़ूंढ़ लेता है। तत्पश्चात उसकी मानसिक अवस्था सुखकारी हो जाती तथा सामने वाले के प्रति कोई दूर्भावना उत्पन्न भी नहीं होती।

मानसिक अवस्था का स्वस्थ व सुखी होना खुशियों का वातावरण बनाता है और वहीं दुखी मानसिकता दुख व कष्टों का वातावरण बना देता है। दिमाग एक है परन्तु दो अलग परिणाम।

यही मुख्य कारण व वजह है कि इंसान विवेकी होने कारण भी मानसिक स्थितियों में संतुलन बना नहीं पाता और जीवन में अविवेकिता का परिचय देते हुए ऐसी चूक कर जाता है कि जीवन पर्यन्त तक कभी न भूलने वाला जीवन भें अपने शूल बना लेता है।

तत्पश्चात इंसान इसी गलत सही अवस्था को अपने दिमाग में सेट कर लेता और उसी के अनुसार अपने समाज में जीने के लिए बेबस व मजबूर हो जाता है और उसी के अनुसार वह व्यवहार करने लग जाता और धीरे धीरे उसी के अनुसार जीने के लिए आदती हो जाता है।

अपनी उक्त मानसिक स्थिति के ही कारण इंसान अपने समाज में अपने परिवेश में घूल मिलकर रहता है या फिर दूरी बना कर रहना पसंद करने लग जा है।
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✒......धीरेन्द्र श्रीवास्तव (हृदय वंदन)

Sunday, 17 May 2020

मेरा हृदय वंदन


मेरा हृदय वंदन....
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     मैं धीरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव (हृदय वंदन) अपने ब्लाग "My Heart" के माध्यम से नीत नए लेख, कविता, कोट्स व पंक्ति वेब साईट पर प्रेषित करता हूँ।

मन में यह विचार उत्पन्न हुआ कि आज हम अपनी कुछ बातों को आप से शेयर करूँ। हमें आप सभी से बताने में गर्व महसुस हो रहा है कि हम उस जमाने के हैं जब घरों में चिट्ठी लिखी जाती थी। सूचनाओं के आदान प्रदान का विशेष माध्यम डाक विभाग व चिट्ठी हुआ करता था।

माँ हमारी अपने ज़माने में अध्यापिका रहीं थी। पिता हमारे रेलवे में लिपिक थे। घर में लिखा पढ़ी का माहोल था। परिवार भी बड़ा था। हम छ: बहन दो भाई थे माता पिता की आठ संतानों में हम नीचे से दूसरे थे।

हम छोटे थे बहनों की शादी हो गई थी। सब अपने ससुराल में थी। उस दौर में मोबाईल नहीं था और फोन अपने समाज में नहीं था। एक दूसरे की खैरियत व समाचारों का आदान प्रदान चिट्ठी से हफ्तों महिनों में होता था।

बिंदास लिखने की आदत बचपन से ही पड़ थी। हर किसी के दूख दर्द को संजीदगी से चिट्ठी के माध्यम से लिखता पढ़ता और दुख दर्द माता जी की तरफ से बाटता था। आदत शुरू से लेखन की रची बसी थी। पेशा भी इक्तेफाक से वकील का ही बना। वकालत में लिखा पढ़ी का अपना अलग तरीका था।

समय बीता व्यवस्थाएं बदली सोशल मीडिया मिल गई वहाँ भी छोटे छोटे मन के विचारों को लिखने लग गया। समाजिक व परिवारिक परिदृश्य ही है जिसमें इंसान जीता है। सुख-दुख, दुख-दर्द, अच्छ-बुरा भी इसी से पाता है और इसी में जीवन जीता व सीखता है।

इंसान कोई भी हो अधिकांशतः व्यक्तियों का सुख दुख व समस्या लगभग एक जैसी ही रहती है। जाहिर है कलम से निकले अच्छे व बुरे शब्दों का असर को व्यक्ति महसुस करेगा।

लेखन का कार्य तब बढ़ गया जब संसार कोरोना जैसी वैश्विक महामारी का दंस झेल रहा है। जिसके घातक प्रकोप से पूरा संसार लाकडाउन की विषम परिस्थितियों को झेल रहा है।

पिछले दो महिने से अपने मूल वकालत के कार्य से विहिन होकर वर्तमान परिस्थितियाँ जनित समस्याओं और दीगर तथ्यों पर लेखन के कार्य को गति मिला। हमारी लेखनी का मुख्य आधार वर्तमान परिवेश व परिस्थितियों के आस पास से जुड़ी है तो जाहिर है किसी के लिए अच्छी व किसी के लिए  बुरी भी हो सकती है।

हमारी लेखनी को अपने व्यक्तिगत जीवन से न जोड़ें। इंसान के आस पास एवं स्वयं की बहुत बातें व समस्याएँ हैं जिसे अपने लेखन द्वारा अपने आपको शुद्ध करने का एक असहज व मुश्किल प्रयास है किसी को दुख देना तनिक भी भाव नहीं है।

जाने अंजाने में आप यदि मेरी कविता, कोट्स व मेरे लेख के माध्यम से जुड़े और आपको पढ़ने का अवसर मिला है।
जिन्हें मेरी लेखनी अच्छी लगी हो उनको सहृदय धन्यवाद व आभार प्रकट करता हूँ।
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यदि मेरे लेखनी से जिस किसी सहृदई को पीड़ा व वेदना झेलना पड़ा हो उनसे सहृदय क्षमा प्रार्थी हूँ।
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हमने फैसला किया है की अपनी लेखनी को निरन्तर बनाए रखना है।
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कृपया हमारी लेखनी को अपने व्यक्तिगत जीवन से न जोड़ें।
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सहृदय धन्यवाद!
🌹🌹
✒......धीरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव (हृदय वंदन)

My heart worship.
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   I send Dhirendra Kumar Srivastava (Hriday Vandan) new articles, poems, quotes and lines on my web site through my blog.

This idea arose in my mind that today we should share some of our things with you. We feel proud to tell you that we belong to the era when letters were written in homes. The postal department and letter used to be a special medium of exchange of information.

Mother was a teacher in our own time. Father was a clerk in our railway. There was an atmosphere of educated education at home. The family was also large. We had six sisters and two brothers. We were the youngest of eight parents and the eldest of the youngest sister.

We were younger sisters were married. All was in her in-laws' house. At that time there was no mobile and the phone was not in its society. The exchange of each other's well-being and news was held in months to months.

The habit of writing bold was from childhood. Everyone's pain was painstakingly written through the letter and the pain was shared by Mother. The habit of writing was settled from the beginning. The profession too became a lawyer only through iqtefak. There was a different way of studying in advocacy.

Whatever the human being, the happiness and sorrow and problems of individuals remain almost the same. Obviously, the person will feel the effect of good and bad words coming out of the pen.

The work of writing has increased when the world is facing the brunt of a global epidemic like Corona. Due to the deadly outbreak, the whole world is facing the odd circumstances of lockdown.

For the past two months, the work of writing on the current situation and the problems arising from the original advocacy gave way to his original advocacy work. The main basis of our writing is related to the surroundings of the present environment and circumstances, then obviously it can be good for some and bad for some.

Do not add our stylus to your personal life. There are many things and problems around and around the human being, which is an uncomfortable and difficult attempt to purify oneself by writing, giving grief to someone is not a feeling at all.

If you know about my poetry, quotes and my articles, then you have an opportunity to read. My heartfelt thanks and gratitude to those who like my writing.
~
If you have suffered from pain and anguish, I would like to offer my heartfelt pardon.
~
We have decided to maintain our authorship continuously.
~
Please do not add our stylus to your personal life.
~
Thank's you.
🌹🌹
✒......धीरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव (हृदय वंदन)

Friday, 15 May 2020

😅हास्य व्यंग्य😅

हे तात!
तुम जब घंटी थाली बजवाते हो!
उनका जाने क्या बजता है?
😍
हे तात!
तुम जब दीप जलवाते हो!
उनका जाने क्या जलता है?
🐭
हे तात!
तुम जब पुष्प वर्षा करवाते हो!
उनका जाने क्या बरसता है?
🐉
हे तात!
तुम अब मौसम का हाल सुनाते हो!
उनका क्या मोशन रद्द करोगे?
🐲
हे तात!
कोरोना काल बहुत संकट की घड़ी है!
उनका क्या इम्यूनिटी चट्ट करोगे?
🐵
हे तात!
तुमने बीस लाख करोड़ पैकेज क्या दिए!
उनका शुन्ना क्यों सट्टक गए?
🐱
हे तात!
जग पुछता सवाल अपने उक्त नीपोरा से!
उनका क्या झंड करे आधार?
😀😂
✒......धीरेन्द्र श्रीवास्तव(हृदय वंदन)


💥💞💥💞💥💞💥💞💥💞💥💞


मदिरा आज से बिक रही है
🍷😀🍷
======
मदिरा आज से बिक रही है।
घर में हैरान परेशान व बेचैन पड़े थे!
खबर ये चली मदिरा आज से बिक रही!
फिर पुछो मत कैसे तन मन में स्फूर्ति आई
सुबह नहा धोकर पैण्ट शर्ट में फौरन आए भाई!
ऐसे मौके पर घरैतिन मौन सहमति जताई!
दिमाग में शुरूर बनने लग गया था!
आँखों को स्पष्ट दिखाई देने लगा था!
शरीर का कोना कोना तिकोना
हुआ जा रहा था क्योकि😀
मदिरा आज से बिक रही है।
🍷😀🍷
✒....धीरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव।


💥💞💥💞💥💞💥💞💥💞💥


डेंगू दिवस हव आज!
😀💥😀

डेंगू दिवस हव आज!
बहुत बहुत बधाई सभे बा।
देश हव आपन दिवस मनेला!
माई बाबू सबही क मनेला!
पर्यावरण दिवस कल्हिए बीतल बा।
🐰
माई दिवस जबर मनल भिया!
फोटू चफनल सबके माई के!
सबही माई दिवस मनैलेस!
ओहू मनैलेस फोटू भेजलेस
पाॅव न छूहलेस माई के।
🐰
दूसरे के खुश करे में सबही जुटल बा
हिंया दी दी सबही करत बा!
सास ससूर जग पूजत बा!
माई बाबू के थूरत बा!
महिमा ओनहने क गावत बा।
🐰
देवतन के कलपाए के अपने!
देखा निबहुरा का पावत बा!
आपन सुख साधे सभे जीयत बा!
भूत से ओके का लेवे के बा!
पिरा केकर के सोचत बा!
🐰
संस्करवे आपन झंड हो रहील बा!
काहे के अब रोअत बा!
एही जीवन के रित भईल बा!
ऐसी जीवन कट जाई हो!
जे आईल बा जईबे करी
केकर खूँटा जबर गड़ाईल बा।
🐰
बिन बुद्धि क दिवस मनावा
भेजा सभही बधाई हो!
का मकसद हव काहे मनेला
एप्पर ध्यान न लगाई हो!
बहुत बहुत बधाई सभे बा।
हमरो बधाई ले ला लोग।
🐰
✒......धीरेन्द्र श्रीवास्तव(हृदय वंदन)

Wednesday, 13 May 2020

मोदीजी शून्य से शिखर तक

मोदीजी शून्य से शिखर तक....
जय हिन्द! जय भारत!
💌
नरेंद्र दामोदर दास मोदी जी ऐसी सख्शियत हैं,
जोकि देश हो या विदेश सभी जगह प्रसिद्ध हैं।
मोदी जी हमारे देश के 15 वें प्रधानमंत्री के रूप
कार्यरत होकर देश को गौरवान्वित किए हैं।
मोदी जी भारत के स्वतंत्रता के बाद के प्रथम
प्रधानमंत्री हैं। आपकी व्यक्तित्व से प्रभावित
होकर आपके जीवन के अहम तथ्यों को
लिपिबद्ध करने का तुच्छ प्रयास किया है।
👇
मोदी नाम एक अधारा दुष्टजनों के पूरण संहारा!
मोदी जब नाम सुनाए गद्दारों के नींद उड़ जाए!
सत्तरह सितम्बर उन्नीस सौ पचास को मोदी जन्मे!
पिता दामोदर दास माता हीरा बेन को धन्य किए।
💌
मोदी जी मोध घांची तेली समुदाय वर्ण में उत्पन्ने।
भारत देश के अन्य पिछड़ा वर्ग श्रेणी में हैं आते।
धन्य हुए माता पिता और धन्य हुई है जन्मस्थली।
धन्य हुई वड़नगर, मेहसाना, गुजरात की धरती।
💌
इनकी महिमा बड़ी निराली दुष्टों को है दूर भगाती!
सन् चौदह में काशी आए माँ गंगा के पुत्र कहलाए!
नर में ही नारायण बसते ईश्वर अंश में धरा पर आए!
गरिबी में जन्म लेकर माता पिता जग धन्य किए।
💌
पिता दामोदर दास मोदी पाँच पुत्रों के पिता बने हैं!
सोमा, अमृत, नरेन्द्र, प्रहलाद व पंकज हैं कहलाए!
परिवार पूर्ण हुआ कन्या बन बहन बसंती जब आईं!
सभी ने गरिबी में लालन-पालन, शिक्षा-दिक्षा पाई।
💌
जीवन कठिनाइयों और बाधाओं से घिरा हुआ था!
चुनौतियों व मुश्किलों से डट कर सामना करना था!
अपने साहस से हर चुनौतियों को अवसर में बदला!
परिवार समर्थन लिए रेलवे स्टेशन पर चाय बनाया।
💌
शुरूआती शिक्षा वडनगर के स्थानीय स्कूल से पाई!
1967 तक हायर सेकेंडरी तक की पढ़ाई पूरी कराई!
परिवार मंशा से 1968 में जशोदा बेन से ब्याह रचाई!
पत्नी संग तलाक नहीं था; अलग जीवन धर्म निभाई।
💌
देशहित को सर्वोपरि बनाए परिवार व छोड़ी लुगाई!
घर छोड़ भ्रमण किए विविध संस्कृति अध्ययन किए!
ऋषिकेश एवं हिमालय जैसे स्थानों का दौरा किए!
सत्कर्म सेवा का भाव लिए कभी साधु बनना चाहे थे।
💌
नियति का सब चाल होता जन सेवा का ज्ञान मिला!
उच्च शिक्षा हेतु 1978 में दिल्ली यूनिवर्सिटी आ गए!
तत्पश्चात गुजरात यूनिवर्सिटी अहमदाबाद जहाँ से!
राजनीति में स्नातक एवं स्नातकोत्तर में शिक्षा पाए।
💌
बचपन की एक शरारती गाथा स्मरण कराता हूँ भाई!
एक दिन तालाब से घड़ियाल का बच्चा घर ले आए!
घर वाले हुए परेशान छोड़ने को नहीं हो रहे थे तैयार!
माता ने उनसे पूछा हमसे तुमको कोई अलग करें तो!
बात दिल में घर आई उसी पल तलाब में छोड़ आए।
💌
➤पढ़ाई के बाद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रचारक बन कैरियर बनाए। हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीतिक दल के कारण दंस भी झेला। सन् 1975–77 में प्रधानमंत्री स्वर्गीय इंदिरा जी के द्वारा आपात काल के दर्मयान संघ पर प्रतिबंध लग गया था। जिसके बावजूद भी नरेन्द्र मोदी जी ने संघर्ष नहीं छोड़ा! जी जान से राष्ट्रवाद के लिए राष्ट्रहित के लिए जूझते रहे! जिस दौरान मोदी जी का प्रबंधकीय,  संगठनात्मक और लीडरशिप कौशल हिन्दुत्व प्रभुत्व देश के सामने आया।
➤इसके बाद नरेन्द्र मोदी राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में राजनीति में शामिल हुए संघ में लेखन का कार्य मिला। देश के प्रति समर्पण देश सेवा के भाव से सन 1985 में आरएसएस के माध्यम से भाजपा में शामिल किए गए।
➤सन 1987 पहली बार अहमदाबाद नगरपालिका चुनावी अभियान को व्यवस्थित किया भाजपा को जीत दिलाई 88-89 में बीजेपी की गुजरात ईकाई के महासचिव बने।
आपने ने लाल कृष्ण आडवाणी की 1990 की सोमनाथ अयोध्या रथ यात्रा के आयोजन में अहम भूमिका निभाई।
➤सन् 1995 में बीजेपी के राष्ट्रीय सचिव और पांच राज्यों का पार्टी प्रभारी बनाकर देश सेवा का मौका दिया गया। सन् 1998 में आपको महासचिव (संगठन) बनाया गया। सन् 2001 में केशुभाई पटेल का मुख्यमंत्री पद रिक्त होने उपरान्त आप गुजरात में मुख्यमंत्री का कमान संभाला।
➤ आप द्वारा गुजरात में मुख्यमंत्री का कमान संभालने के उपरान्त गुजरात राज्य भयंकर भूकंप त्रासदी में घिर गया! गुजरात त्रासदी में 20 हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे! मोदी के सत्ता संभालने के लगभग पांच महीने बाद गोधरा रेल हादसा हुआ जिसमें कई हिंदू कार सेवक मारे गए थे।
➤इसके ठीक बाद फरवरी 2002 में ही गुजरात में संप्रदायिक दंगे भड़क उठे इन दंगों में हजारों से ज्यादा लोग मारे गए। आप पर दंगे के आरोप प्रत्यारोप लगाए गए बदनामी झेला। परन्तु अपने कर्तव्य निर्वहन व कुशल कार्यशैली व नेतृत्व से! स्थितियों को सहजता से संभालते हुए पद पर आसीन रहे।
➤गुजरात दंगों असमान्य स्थितियों के कारण आप के खिलाफ कई देशों के विरोध वश अमरीका जाने का वीजा नहीं मिला। ब्रिटेन सरकार ने दस साल तक उनसे अपने रिश्ते तोड़े लिए।
मोदी ने सत्ता संभालने के साथ खुद व राजनीतिक संगठन मजबूत करने और राज्‍य के विकास के कामों में लगा दिया।
➤सबसे महत्वपूर्ण यह रहा कि दंगों के चंद महीनों के बाद ही आपने दिसंबर 2002 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की। आपको सबसे ज्यादा फायदा उन इलाकों में हुआ जो दंगों से सबसे ज्यादा प्रभावित थे जनता ने पूर्ण विश्वास दिखाया।अपने कुशल नेतृत्व से जनता के भरोसे व विश्वास को जीता।
➤इसके बाद 2007 के विधानसभा चुनावों में आपने गुजरात के विकास का मुद्दा बनाया और फिर जीतकर सत्ता में लौटे। सशक्त व कुशल नेतृत्व की वजह से आपने सन् 2012 में भी भाजपा गुजरात विधानसभा चुनाव में जीत हासिल किया।
➤आपकी कार्य कुशलता कार्यशैली आपकी सोच अनोखा था! आप बहिर्मुखी प्रतिभा के धनी स्वच्छन्द ख़्यालात रखते थे! अनेक तरह के गेट अप व अनेक स्टाईल अपनाते रहते थे! कभी बाल बढ़ा लेते तो कभी दाढ़ी तो कभी क्लीन सेव भी। रंगमंच आपको खूब भाता था अपने रोल पर संजीदा रहे थे।
➤अपने क्रियात्मक शैली के कारण विचारों का शोध करते थे! उद्योग की बात हो या कृषि की, आपने लोगों के सामने एक बेहतर विकल्‍प देने की कोशिश की परिणाम सार्थक ही रहा! सरकारी और गैर-सरकारी संस्‍थाओं ने कार्य को सही माना।
➤सन् 2014 में आप लोक सभा का चुनाव वाराणसी से लड़ा! भाजपा के साथ आपने ने ऐतिहासिक जीत हासिल किया। आजादी बाद बंपर जीत दर्ज करते हुए पहले प्रधानमंत्री बने आप भारतवर्ष के 14 वें प्रधानमंत्री के रूप में गौरवान्वित हैं।
➤23 मई को एक बार फिर आप वाराणसी से सांसद चुने गये। 30 मई को आपने दुबारा से प्रधानमंत्री पद की शपथ लिए। प्रधानमंत्री बनने के पहले से लेकर बाद तक आपने अनेंको भारत देशहित व विकास के लिए कई महत्वपूर्ण कार्य किये।
न कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि न ही धन सम्पदा जुटाई!
शून्य से शिखर की यात्रा हिम्मत व कुशल रणनीति थी!
पुस्तक में रूची थी तभी वाद विवाद कला सुन्दर थी!
युग पुरूष हैं युग प्रणेता हैं शदियों बाद जनम लेते हैं।
💌
myheart1971.blogspot.com
✒......धीरेन्द्र कुमार (हृदय वंदन)

Tuesday, 12 May 2020

जो आया देश को लूटा

🔥
जो आया इस देश में अपने!
उसका मकसद एक ही था!
लूटपाट किए मानवता तोड़ा!
सनातन संस्कृति नष्ट किया!
सबने मिल भ्रष्टाचार किया!
मन मुताबिक इतिहास गढ़ा।
~~
अपने देश के चंद गद्दारों ने!
निज स्वार्थ गुणगान किया!
उनकी महिमा उनका चरित्र
देश के भविष्य को बतलाए!
जो ज्ञान उसने उनसे पाया!
भविष्य सत्य व सही जाना।
~~
अपने देश के वीरों को भूल
आतंकियों का मान किया!
वीरों का शौर्य उनका पौरुष
इतिहास में गुमनाम रखा!
संस्कृति का विनाश किया!
देश का सत्यानाश किया।
~~
बाबर हुमायूं अकबर आया!
अपने ढ़ंग से देश में चलाया!
अपने गलत संस्कार पढ़ाए!
संस्कार अपने अमल कराए!
टोली में आए जन भरमाए!
अपनों को ही गद्दार बनाए।
~~
अंग्रेज भी आए ऐसाही किए!
सोने की चिड़िया लूटके गए!
अपनी शिक्षा अपने संस्कार!
जन जन में भर किए बर्बाद!
गलत संस्कृति दौड़े है आज!
जिन्हें अपनाए जीए समाज।
~~
देश की मनोवृत्ति ऐसी आज!
फंसे युवा पश्चिमी सभ्यता में!
घृणा करे अपनी सभ्यता पर!
अपने संस्कृति पर इंसल्ट करे!
उनके संस्कृति पर प्राउड करे!
कहाँ जा रहा अपना समाज!
~~
हिन्दी से इन्सल्ट फील होता!
अंग्रेजी से प्राउड फील करते!
राम राम इन्सल्ट फील होता!
हाय बाय प्राउड फील कराते।
बैठ खाए इन्सल्ट फील होते!
खड़े खाए प्राउड फील करते।
~~
अपनी संस्कृति की निंदा करें
अपने अपनों की निंदा करके
जो दूसरों का गुणगान करे हैं
बिगाड़ रहे भविष्य के आधार!
खोदे जड़ ले पश्चिमी संस्कार!
तभी गर्त में जा रहा समाज।
~~
आतताईयों का गुणगान करे !
देश के वीरों का अपमान करे !
अकबर सिकन्दर महान पढ़ाए!
राणा सांगा और वीर शिवाजी
भगत सिंह चन्द्रशेखर आजाद
सपूतों को देश में रखा गुमनाम।
~~
वीर सपूतों के सच्ची कुर्बानी से
देश गुलामी से आजाद हुआ!
अंग्रेजियत से देश मुक्ति पाई!
फिर जो सरकार सत्ता में आई!
ऊँचा पयजामा बढ़ाने के मंशा
से इसने वैसे ही सत्ता चलाई।
~~
ऐसा जहर बो दिया धरती पर!
काट रहा आज दामोदर दास!
करो सपोर्ट जी जान से उसका!
देश ने ऐसा सशक्त पीएम पाया!
ईश्वर से कम नहीं इनकी आभा!
शदियों बाद मिला ऐसा योद्धा।
~~
जय सियाराम जय जय राम!
गौरवान्वित अपना देश आज!
मेरा पीएम देश का अभिमान!
पीएम को सादर अपना प्रणाम।
💞💞
✒......धीरेन्द्र कुमार (हृदय वंदन)

Monday, 11 May 2020

वकील से कवि मन


वकील से कवि मन....
🍁🍁
अचछे  खासे वकील रहे
आपदा  में  मौका   मिले
मन बदला बन गये कवि
कविता  गुन  गुनाने लगे
                  कवियों वाले भाव बन गये
                  बोली भाषा सब बदल गये
                  बदल  गये  रहन  सहन भी
                  जैसे पहले वकील ही न रहे
जोड़  तोड़ से पंक्ति रचते
शब्दों  में  संतुलन साधते
विकट समस्या यह आयी
रचना अपने किसे सुनाते
                  डरता  था  गड़बड़  न हो
                  ऊँच  नीच  हमसे  ना  हो
                  हिम्मत अपने जुटाये हम
                  स्त्री को सुनाए चाहे न वो
चटक  कविता पढ़ रहे थे
चेहरे का भाव देख रहे थे
देख  कर  लिये आकलन
चेहरे पे भाव सुन्दर रहे थे
                  मन प्रसन्न हो गया अच्छा
                  जैसे पास हों पहली कक्षा
                  झट  बोला  देखो  श्रीमती
                  पति  वकील  कवि अच्छा
पत्नी तनि क्रोध में बोली
तुमने  कैसी रोग मोलली
सुनते  ही दुखी मन हुआ
भड़की  राम  नगर वाली
                  चुप  हुआ क्या करते भी
                  बातों  में  उनकी  दम थी
                  दिन  फोकट  का अपना
                  बाहर  कोरोना खतरा थी
🍁🍁
✒......धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

Friday, 8 May 2020

जोत लो आतंकिस्तान

।।शहिदों को नमन।।
अब जोत लो आतंकिस्तान!
बहुत हो चुकी आँख मिचोली!
जब आती ताबूत शहीद की!
मन व्यथित फटती छाती।
~~
श्रद्धांजली से मुक्ति न मिलेगी!
आतंकी कब्र खोदने की बारी।
इसमें तनिक विलम्ब न करो!
शांति का जाप अब बंद करो!
~~
जुर्रत न हो आँख उठा सके!
ऐसा खौफ जेहन में भर दो।
पीढ़ियां उनकी थर थर काँपे!
ऐसा कहर उन पर बरपा दो।
~~
बहुत हुई सपूतों की कुर्बानी!
अब और कुर्बानी सहन नहीं!
मातृभूमि का सीना हो छलनी!
ऐसी विवशता अब मंजूर नहीं।
~~
शस्त्रों का रूख ऊधर कर दो!
आतताई जिधर बसते हो!
अग्नि तेजस चिनूक रफेल का
गंभीर परीक्षण उन पर कर दो।
~~
जनमानस व्याकूल धरा का!
कब आतंकिस्तान नष्ट होगा!
देश की जनता सीख चुकी है!
कैसे देशहित में डटके लड़ना।
~~
मातृभूमि का हर जन योद्धा!
एक रहा संकट की घड़ी में!
ऐसी अनेक पहचान धरा की!
कोरोना ने भी सीखा डाली।
~~
अब जोत लो आतंकिस्तान!
बहुत हो चुकी आँख मिचोली!
जब आती ताबूत शहीद की!
मन व्यथित फटती छाती।
❣❣


🐭
हर जगह है नालायकियत!
देश समाज या परिवार हो!
इस का खाना इस का पीना!
इसी को मार पिट गाली देना!
गद्दारी नहीं तो और क्या है...?
~~
देश हित कभी नहीं सोचना!
अपने हित पर आहें भरना!
कुछ करना न कुछ न भरना!
बिना किए सब कुछ पा लेना!
गद्दारी नहीं तो और क्या है...?
~~
अपने कर्तव्य याद न रखना!
दूसरों पर सिर्फ अंगूली उठाना!
अपनी गलती भूल सहज ही!
बूरा भला बिन सोचे कह देना!
गद्दारी नहीं तो और क्या है...?
~~
हर वक्त मन से बुराई ढूंढ़ते!
कैसे हड़प लूँ कैसे लूट लूँ!
कैसे अपना हित साध लूँ!
बाकी से उनसे क्या लेना!
गद्दारी नहीं तो और क्या है...?
~~
गलत किया है गलत देखा है!
पुश्तैनी गलत जीवन जीया है!
गलत तभी दूसरों पर थोपते!
सबको उसी साॅचे में तौलते!
गद्दारी नहीं तो और क्या है...?
🐶
✒......धीरेन्द्र कुमार (हृदय वंदन)



Wednesday, 6 May 2020

भाषा व वाणी का महत्व


आपनी वाणी कृपानिधाना!
सुख होवे है प्यार से रखना!
गले में डाले फूलों का हार!
तनिक सरके जूतों का हार।
~~
इसमें भी है बड़ी विडम्बना!
बोल के बातें भूल भी जाना!
अपनी कछू याद न रखना!
दूसरे की तो गठियाए रहना!
~~
नेचर इनका बड़ा विकराला!
सुनके दूसरे की बिफर जाना!
बिन समझे कटु वचन सुनाने!
दूरी बनाओ फिर तुम जनाने।
~~
क्षण में मोहब्बत में उतराते!
क्षण में नफरत से भर जाते!
दिल के साफ अकल के अंधे!
प्रेम प्यार को लट्ठ से खोजे।
~~
वाणी महत्व को ये न समझे!
गलत मतलब  दूसरे का ढूंढ़े!
मनुष  होते ऐसे सदा अभागे!
बिन मतलब के संकट बढ़ाते।
~~
अपनी वाणी कृपानिधाना!
सुख होवे है प्यार से रखना।

💞💥💞

।।अपनी भाषा अपनी वाणी।।
🤔
अपनी भाषा अपनी वाणी;
सुख दुख की है  महारानी।

प्रेम करें जो अपने जुबां से;
मान वही सम्मान बढ़ाए।

नियंत्रित  रहे  वाणी भाषा;
सुखमय जीवन निभ जाता।

वैमनुष्यता  पनप न पाता;
सहज सुखद जीवन होता।

अपनी भाषा अपनी वाणी;
अच्छे बूरे वक्त काम आती।

विनम्रता जो इससे जुड़ जाए;
सदाचारी जीवन तब हो जाए।

कर्कश जब अपनी वाणी हो;
कंटक हर पग मौजूद मिलें।

अपनाएं गौरवान्वित हो जाएं;
कबीर की अमृत यह वाणी.....

ऐसी वाणी  बोलिए,  मन का आपा खोये।
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए।।

💥💞💥💞
💥कविता का भाव :-
💥मानव जीवन में उसकी अपनी बोली और भाषा का बहुत ही महत्व है। मानव का मान सम्मान, आदर अनादर सब उसकी बोली और उसकी भाषा के अनुसार घर परिवार व समाज में होता है।
इंसान अगर प्रेमी है तो उसे अपने द्वारा बोले जाने वाले शब्दों से भी प्रेम करता है और कुछ भी कहने सुनने व बोलने से पहले अपनी बोली व भाषा को प्यार से परखता है जाॅचता है कि जिससे अपने सुनने वालों को किसी प्रकार से आहत न करे। यह काम इतना आसान नहीं पर अपने लिए ही हितकारी है और खूद का मान सम्मान बढ़ाता है।
💥अगर इंसान के बोली भाषा पर नियंत्रण है तो कितना ही शातिर कोई क्यों न हो वैमनुष्यता की संभावना कम रहती संतोषजनक व सुखमय जीवन बनता है। अच्छे व सम्मानित शब्दों व भाषा का इश्तेमाल करने से इंसान का कठोर व मुश्किल कार्य (अच्छे व बुरे) सहज व सरल हो जाता कभी कभी तो कल्पना से परे भी होता कि यह कार्य कैसे हो गया। ऐसा करने से इंसान का खूद का जीवन साथ में उसके संपर्क में रहने वाले लोगों का भी जीवन सदाचारी बनता। 
💥अगर बोली भाषा तथा शब्दों मे मधूरता नहीं है तो मान कर चलें की जीवन आपका दुखों से भरा है; आपके जीवन में हर क्षण हर पग मुश्किले व परेशानियां मौजूद मिलेगी। उक्त के संदर्भ में कविवर संत कबीरदास जी की अमृत वाणी का प्रसंग अतुलनीय व महान है।
💞💥
✒....धीरेन्द्र कुमार श्रीवास्तव।

Tuesday, 5 May 2020

प्रभू का सहारा

❣❣
अटकी भंवर में गरीबों की पीड़ा!
एक ओर खाई तो दूजे है कुआं।
तुम्हारे ही सहारे प्रभू जी रहे हैं!
कृपादृष्टि सदैव सभी पर धरे है।

दुख की घड़ी में झेले जा रहे हैं!
प्रतिष्ठा के आगे बेबस खड़े हैं।
अगर मुँह खोले प्रतिष्ठा गिरी है!
प्रतिष्ठा देखे जिन्दगी न बची है।

संकट धरा पर पहले भी रहीं थी!
समय पर अपने चली भी गईं थी।
हर अंधेरे के बाद उजाले तो होंगे!
विश्वास धरेंगे संकट से पार होंगे।

जीवन कभी एक जैसा न होता।
दुख भी होता तो सुख भी होगा!
सुख में रहो धैर्यता पूर्वक जीना!
दुख में सिद्दत से लड़के है जीना!

सभी के अपने अलग हैं तरीके!
जीने के अपने अलग हैं सलीके!
एक जैसी सोच सभी में कहाँ!
कोई जोड़े है तो कोई तोड़े यहाँ। 

प्रभू के सहारे जीवन की नैय्या!
तेरी कृपा से पार होगी रे भैय्या!
अभी तक तेरे ही सहारे खड़े हैं!
आगे भी पार आप ही तो करेंगे!
❣❣
कविता का भाव:-
☆  वर्तमान महामारी में आज पूरे विश्व की मानवता हैरान, परेशान, बेबस व लाचार है। सबसे ज्यादा बेबस व लाचार आज अपना गरीब समाज है जिनके लिए रोज कुआं खोदना व पानी पीने जैसी बात है; आज पूर्णतया असहाय, बेबस व लाचार है। जिन्दगी की डर से घर में बैठा है वहीं बाहर निकलने पर मौत का डर है। करे भी तो क्या एक तरफ उसके कुआं तो दूसरे तरफ मौत की गहरी खाई बनी है।
☆  जो कुछ गरिमामयी पदो पर आसीन होकर जीविका चला रहे थे उनके लिए भी विकट स्थिति आन पड़ी है। चाह कर भी अपने प्रतिष्ठा व मान सम्मान के खिलाफ जाकर किसी से अपनक वेदना ही कह पा रहा।
☆  पहले भी समस्याएं थी लेकिन किसी ने ऐसी समस्या के बारे में कभी सपने में भी नहीं सोचा था। अप्रत्याशित अकास्मिक घटना ने मानवता को हिला कर रख दिया है।
हर किसी के जीवन की यह अविष्मरणीय घटना है यह मुश्किल लड़ाई है जिसे धैर्यता के साथ दृढ़ता लड़ कर आगे के राश्ते बनाने हैं।
☆  आज ईश्वर ने हमें एक मौका दिया है कि हम आगे भी आने वाली इस तरह की चुनौतियों के लिए अपनी कमर कस लें।
✒......धीरेन्द्र श्रीवास्तव (हृदय वंदन)

ससुराल मायका बहू बेटी...

ससुराल मायका बहू बेटी... 🍁🍁   ससुराल मायका बहू बेटी! दोनों जहान आबाद करती। मायके से ट्यूशन गर लिया, दुखों का जाल बिछा लेती। जहां कभ...