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Friday, 14 May 2021

गुगल गुरू....

।।गुगल गुरू।।
🍁🍁 
गुरूओं का गुरू बन गया
आ  गया देखो गुगल जी।
                     गुरू महत्व भी कम किया
                     मार डाट भी खतम किया।
                     हर सवाल का जवाब देता
                     बिना  फटकारे  गुगल जी।
क्या महत्व क्या गुरू अदब
क्या  जाने   विद्यार्थी   जी।
ले   कनेठी    बोरड़ी   ऐठी
कहाँ गरू अब विद्यार्थी जी।
                    ऐसा गुल खिलाया गुगल ने
                    अशिष्ट हो रहा विद्यार्थी जी।
                    नैतिक  शिक्षा,  नीतिशास्त्र
                    खतम होते शिष्टाचारी जी।
शास्त्र  बहुतेरे ज्ञान बटोरे
ले स्लाईडर मोबाईल जी।
घरेले नुस्खे बाबा दादी के
भूल  चुका  हर  कोई जी।
                   गुगल  ही  हर  नुस्खे देता
                   याद  करें  क्यूँ  कोई  जी।
                   गुरूओं का गुरू बन गया
                   आ  गया देखो गुगल जी।
गुरूओं का गुरू बन गया
आ  गया देखो गुगल जी।
🍁🍁
.✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

Sunday, 9 May 2021

ममता जागृत रहती....

ममता जागृत रहती....
🍁🍁
माँ की ममता  जागृत रहती,
उसके  अंश  कहीं भी होती।
उठ  उठ  कर  उसे निहारती,
नींद  में  सोया  रहे  तब भी।
                        ठंड लगती माँ व्याकुल होती,
                        लाडले  को  चादर  ओढ़ाती।
                        हर  क्षण  फिकर में माँ होती,
                        दूर  व  पास  जहाँ भी रहती।
अपने  खुशियों  के  हर  पल,
हंसी  खुशी  माँ त्याग करती।
भूला  कर  पीड़ा व दुख दर्द,
ममता  पर असर  नहीं फर्क।
                       सुख की कामना लिए माता,
                       महफूज  बलाओं  से रखती।
                       स्वस्थ  रहे सुखी रहे आबाद,
                       दुआ यही माँ का आशीर्वाद।
मामता  अगर   दुखी  होती,
किस्मत अभागे की उसकी।
                       हंसी  खुशी  माँ को रहने दो,
                       दुखी  नहीं  उसको  होने दो।
🍁🍁
✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

मच्छर और पत्नी....

मच्छर और पत्नी....
😀
रात  मच्छर, पत्नी ने धुन छेड़ दी।
यार सुबह हो गयी मेल्हते मेल्हते।।
😲
मच्छर  दूर  हुआ फैन चालू किया।
खर्राटा पत्नी  फर्राटा  भरने लगी।।
😯
दुश्मनों  में  मेरी  रात  ऐसी  फंसी।
रात  भर  नींद  मेरी तड़पती रही।।
😢
दोनों  ही  रात  में  दुश्मनी  साधते।
रात का सुख चैन जालिम ले बीते।।
🐉
मच्छरों  का ईलाज जैसे तैसे हुआ।
खर्राटे  का  ईलाज  बताओ सही।।
😀
✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

Saturday, 8 May 2021

आपन लरकईयां.....

आपन लरकईयां.....
🍁🍁☛..... #हृदयवंदन
जवन   आपन   जमाना  रहल
याद  आपन  लरकईयां भयल
घरवा  जब बियाह पड़त रहल
खटिया  तोसक  बर्तन भड़वा
मांग  जाच  सब  आवत रहल
मांगब जाचब शोहत भी रहल
                हंसी  खुशी  सबही  करत  रहल
                बुकनी  बोर  नाम  लिखत  रहल
                ठंण्डी  क  दिनवा  आवत  रहल
                दलाने ओसारे पुवरा पलत रहल
                बाबा दादी के संगही सुतत रहल
                कहानी किस्सा खुब सुनत रहल
उधम  चौकड़ी   मचत  रहल
बुढ़ पुरनिया खिसियात रहल
हाथ  पैना  ले  धौड़ाए  रहल
हमहने बदे तब बगईचा रहल
आती पाती चोरवा क जमल
खेलही  क  अपने  धून रहल
दूसर  कवनो  न जुनून  रहल
               पुरनक  बखतिया  निक  रहल
               मउजे  मउज  हमहने  क रहल
               कवनो   नाही   समस्या   रहल
               जवन  मिले  खा  लेवे के रहल
               खा  पी  कर  सुतही  के  रहल
               जवन   आपन   जमाना  रहल
आज  हेराई  लरकईयां गयल
बाबा दादी संग भैय्या न रहल
अब  कहानी  न किस्सा रहल
जवन जमाना अब आई गयल
खेलकूद अब  मोबाईल बनल
सब   अब  आनलाईन  भयल
🍁🍁
✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

Friday, 7 May 2021

हम जीतेंगे...

हम जीतेंगे...
🍁🍁
जंग है  जाने का गम है,
पर जीतेंगे हममें दम है।
 मौत से  है  युद्ध लड़ना,
 दर्द  को  सहना  तब  है।

हालात  ऐसे बन गये हैं,
खौफ से सब डरे गये हैं।
मानवता  दर्द  झेल रहा,
 संवेदना  से  दूर  गये हैं।

गम  में  अब नहीं डूबेंगे,
लड़ाई  खुद की  लड़ेंगे।
 जंग है  जाने का गम है,
  हममें दम है हम जीतेंगे।
                 🍁🍁
✒......धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

इंसान की होड़....

इंसान की होड़..!!
🍁🍁
बंदी का फैसला क्या आयी,
बाजार  में  भीड़  लग गयी।
रख  सके  राशन  जुटा कर,
सब   में   होड़   लग   गयी।
                   खौफ  मौत  सिर क्या हुयी,
                   जीने  की   होड़  मच  गयी।
                   जरूरी  जिन्दगी   के  लिए,
                   आक्सीजन  फिर लूट गयी।
धीर"  मन  अपना  सोचता,
अधीर  क्यों   इंसान  होता।
धैर्य खोता न रखता विश्वास,
आस्थावान  ऐसा  न करता।
                    🍁🍁
          ✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

Thursday, 6 May 2021

जीवन की रीत....

जीवन की रीत.....
🍁🍁
जीवन  की यही रीत सदा,
मिलना बिछड़ना होता है।
                          सुख  के  साथ  दुख होता,
                          दुख  सोच  इंसान रोता है।
सदियाँ बिती युग बिता पर,
कार्य  नहीं कोई रूकता है।
                          देखो  चाँद  और सूरज को,
                          समय  पर  आना जाना है।
दिन  ढ़ल जाता रात होती,
एक   नया   सबेरा  होता।
                           मन शांत रखना उदास नहीं,
                           धैर्य   से    राह   बनता   है।
🍁🍁
✒.....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

ऐसी कोई रात नहीं....

ऐसी कोई रात नहीं..
🍁🍁
ऐसी   कोई   रात   नहीं,
जिसकी  सुबह  न हुयी।
गम की अंधेरी रात बड़ी,
उगा  सूरज तो छट गयी।

सुक्रिया मेरे मालिक की,
हर  सुबह  आँख खुली।

दिन ढ़ली फिर रात हुयी,
रात   गयी   सुबह  हुयी।
प्रकृति  का  दस्तूर  यही,
धीर   धरें   अधीर  नहीं।

बात   उसकी   भी  सही,
मौत   की   सुबह   नहीं।
जिंदगी  भी  अमर  नहीं,
पर  जीवन  खतम नहीं।

जीवन  का  दस्तूर  यही,
आया  तो जाना है सही।

जो  अपने बस का नहीं,
खामोश रहना ही भली।
करो नहीं मन को अधीर,
कह रहा आपका "धीर"।
🍁🍁
✒.....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"




ऐसे भी हालात.....

ऐसे भी हालात.....
🍁🍁              मंजर   ऐसी  बदहाली  का।      
                       साथ  नहीं कोई किसी का।।
                       जिन्दगी की सबको पड़ी है।
                       मौत  जब  सामने खड़ी है।।
लाश धरी कोई पास नहीं है।
रिश्ते  नाते  बेजान  रही है।।
देख   इंसा  मजबूर  मरा है।
मानव  मानवता से डरा है।।
                     डर  से   बेबस  दूर  खड़ा  हैं।
                     क्यों  न  रहे  जीवन  पड़ा हैं।।
                     फर्ज अदायगी दूर से करा है।
                     हालात बदल नहीं पा रहा है।।
डगमगा  रही  जीवन नैय्या।
किस  किनारे लगे रे भैय्या।।
धीर  धरें  प्रभु शीश नवैय्या।
सबके जीवन राम खेवैय्या।।
🍁🍁
✒......धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

Tuesday, 4 May 2021

लाकडाउन में सुरा प्रेम...

लाकडाउन में सुरा प्रेम...
🍁🍁 
सुरा सोम रस  प्रेमी आशिक,
कोविड  से  वंचित  शोषित।
उखड़  रही थी अपनी साँसें,
सुस्त   काया  धुमिल  नजरें।

सही समय से घोषणा  होता,
वर्ना घर काल कोठरी होता।
सुध   लेती  अपनी  सरकार,
दुकान खुली मदिरा की यार।

सुन  स्फूर्ति  तन  मन  आई,
नींद  उड़ी जाग रात बिताई।
भोरहरिए  पैण्ट  शर्ट  चढ़ाई,
पहुँच  गया  दुकान पर भाई।

जब  नम्बर  सौवां पर लागा,
मिलने  की संभावना जागा।
शुरूर  शुरू  जेहन में अपने,
उछल कूद धड़कन में अपने।

चाहत    अपना   रंग  लाया,
हाथ  में  जब  बोतल आया।
सरकार  का  तब  गुन गाया,
छक  कर खूब जश्न मनाया।

खतम  जश्न और घर आया,
बेगम  ने  खूब  भूत  उतारा।
झाड़ू  चप्पल  हुआ  आरती,
गाली  गुफ्ता  दे गई सारथी।

मिला सोमरस भूला भारती,
क्या हुआ थोड़ा हुआ आरती।
♨♨
✒....धीरेन्द्र श्रीवास्तव "धीर"

ससुराल मायका बहू बेटी...

ससुराल मायका बहू बेटी... 🍁🍁   ससुराल मायका बहू बेटी! दोनों जहान आबाद करती। मायके से ट्यूशन गर लिया, दुखों का जाल बिछा लेती। जहां कभ...