गीत
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जाने क्यूँ नफ़रत कर हमने,
खूद को क्षति पहुँचायी है।
क्या करूँ पगले मन का,
कटुता खूद ही बढ़ायी है।
जल भुन नफ़रत में हमने,
पीड़ा जिसे पहुँचायी है।
जानबूझ के इस पीड़ा को,
अपने भी गले फंसायी है।
प्रेम ही प्यार की जननी है,
क्रोध से कटुता बढ़ती है।
प्यार बाटे हैं प्यार मिले है,
नफ़रत से नफ़रत बढ़ती है।
कुदरत ने मानव को दिया है,
पंचतत्व अमृत वरदान यहाँ।
नहीं सोचता अपने मान की,
कर्तव्य सदा करता ही रहा।
हवा जल का रूख़ है बहना,
रोक भला कैसे पाएगा।
रोकने की सोचेगा जिस दिन,
खूद ही वजूद मिट जाएगा।
कुदरत ने हर एक इंसा को,
जीवन एक समान दिया।
इंसान ने भेद भाव करके,
कुदरत को झूठा बना दिया।
भोग रहा आज हर इंसान,
कुदरत से खेलवाड़ किया।
कोरोना रूपी वायरस से,
खूद ही जान फंसा डाला।
कोयला लोहा पिघलाता,
पर खूद साबुत नहीं बचता।
यहीं कहानी गढ़ रहा है,
हर एक इंसा आज यहां।
स्वभाव इंसा का प्रेम भाव है,
नफ़रत का कोई स्थान नहीं।
प्रेम भाव को जब जब रोका,
खूद नफ़रत के बलि चढ़ा।
जाने क्यूँ नफ़रत कर हमने,
खूद को क्षति पहुँचायी है।
का करूँ इस पागल मन का,
कटुता खूद ही बढ़ायी है।
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✒.....धीरेन्द्र श्रीवास्तव (हृदय वंदन)
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